भगत सिंह का राष्ट्रबोध
भगत सिंह के लिए देश केवल मिट्टी, शहर या गाँव नहीं था। उनकी नज़र में देश की असली पहचान उसकी जनता और उसकी चेतना से होती है। भगत सिंह सिर्फ इतिहास नहीं हैं, वे आज भी जनता से सवाल पूछने वाला ज़िंदा विचार हैं।
जनता ही राष्ट्र
भगत सिंह मानते थे कि जब तक जनता शोषण और अन्याय में जकड़ी है, तब तक किसी भी देश को वास्तविक आज़ादी नहीं मिल सकती।
एक अनोखी पुस्तक
हिन्द-युग्म द्वारा ‘भगत सिंह: इतिहास के कुछ और पन्ने’ पुस्तक का विमोचन गाँधी शांति प्रतिष्ठान सभागार में किया गया। पुस्तक का लोकार्पण प्रसिद्ध साहित्यकार और कुलपति विभूति नारायण राय ने किया। इस अवसर पर वैचारिक गोष्ठी भी आयोजित हुई।
विचार गोष्ठी
गोष्ठी का विषय था— बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा। इसमें कई वरिष्ठ बुद्धिजीवियों ने भाग लिया।
प्रमुख वक्ता
प्रो. चमन लाल, हिमांशु जोशी और भारत भारद्वाज ने कहा कि भगत सिंह केवल क्रांतिकारी नहीं, बल्कि एक विचार और दर्शन थे।
ब्लॉग से किताब तक
यह पुस्तक हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया की पहली ऐसी कृति है, जो पहले ब्लॉग पर क्रमशः प्रकाशित हुई और बाद में पुस्तक रूप में आई।
लेखक की प्रेरणा
लेखक प्रेमचंद सहजवाला के अनुसार, 1990 के दशक की राजनीतिक-साम्प्रदायिक घटनाओं ने उन्हें भारतीय इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित किया।
आज़ादी के तीन रास्ते
हिमांशु जोशी ने बताया कि भारत को आज़ादी गाँधी के अहिंसक मार्ग, भगत सिंह-आज़ाद की क्रांति और सुभाष बोस के सैन्य संघर्ष से मिली।
भगत सिंह का अलग दृष्टिकोण
भगत सिंह मानते थे कि शासक चाहे काले हों या गोरे, जब तक व्यवस्था नहीं बदलेगी, तब तक जनता की हालत नहीं बदलेगी।
फाँसी भी एक विचार
भगत सिंह ने अपनी फाँसी को एक वैचारिक हथियार के रूप में चुना। वे मानते थे कि देश की आज़ादी के लिए उनका बलिदान ज़रूरी है।