
मनुस्मृति और जन्मना जाति का भ्रम मनुस्मृति उस युग की रचना है जब जन्म से जाति तय करने की कोई अवधारणा ही नहीं थी। इस ग्रंथ में समाज व्यवस्था को जन्म नहीं, बल्कि गुण, कर्म और स्वभाव से जोड़ा गया है।

वेदों के आदेश का पालन महर्षि मनु ने समाज रचना वेदों के निर्देशों के अनुसार की। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद सभी मानव को कर्म के आधार पर पहचानने की बात करते हैं।

वर्ण का अर्थ क्या है? वर्ण शब्द “वृञ” धातु से बना है, जिसका अर्थ है चयन। यानी व्यक्ति का वर्ण उसके गुण और कर्म से चुना जाता है, जन्म से नहीं।

मनुस्मृति में जाति का उल्लेख क्यों नहीं? मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में जाति या गोत्र शब्द कहीं नहीं मिलता। केवल चार वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है, जो जातिवाद के विरोध का स्पष्ट प्रमाण है।

जन्म से श्रेष्ठता का कोई प्रमाण नहीं कोई भी व्यक्ति यह सिद्ध नहीं कर सकता कि उसके पूर्वज सदा से ऊँची जाति के थे। तो फिर किसी को जन्म से शूद्र मानने का अधिकार कैसे हो सकता है?

कुल और गोत्र का घमंड निषिद्ध मनुस्मृति कहती है कि जो व्यक्ति कुल या गोत्र के नाम पर सम्मान चाहता है, वह निंदनीय है। सम्मान का आधार जन्म नहीं, बल्कि आचरण और विद्या है।

सम्मान के पाँच मानदंड धन, संबंध, आयु, श्रेष्ठ कर्म और विद्वत्ता — यही सम्मान के असली मापदंड हैं। जाति, वंश या गोत्र को मनु ने कहीं भी मान्यता नहीं दी।

वर्ण परिवर्तन संभव है मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण शूद्र बन सकता है और शूद्र ब्राह्मण। वर्ण स्थायी नहीं, बल्कि कर्म और आचरण से बदलने वाला है।

शिक्षा ही वास्तविक जन्म मनु कहते हैं — हर मनुष्य जन्म से शूद्र यानी अशिक्षित होता है। विद्या प्राप्ति के बाद ही उसका दूसरा जन्म होता है, जिसे द्विज कहा गया है।

शूद्रों के प्रति सम्मान और करुणा मनु शूद्रों को हीन नहीं, बल्कि परिस्थितिवश वंचित मानते हैं। अतिथि, सेवक और वृद्ध शूद्र को पहले सम्मान देने का विधान है।

असली मनुवाद क्या है? मनुस्मृति जन्मना जातिवाद नहीं, गुण-कर्म आधारित मानवता सिखाती है। जन्म से श्रेष्ठता मानना मनु के अनुसार अज्ञान और समाज के लिए कलंक है।