
वर्ण है, जाति नहीं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को वेदों में जाति नहीं बल्कि वर्ण कहा गया है। वर्ण का अर्थ है – जिसे अपनाया या चुना जाए, न कि जन्म से मिला हुआ।

आर्य और दस्यु भी थे वर्ण केवल चार ही नहीं, बल्कि आर्य और दस्यु भी वर्ण कहे गए हैं। जिसने आर्य कर्म अपनाए, वह आर्य वर्ण में आया और दस्यु कर्म करने वाले दस्यु वर्ण कहलाए।

रुचि और कर्म से बनता है वर्ण वर्ण का आधार रुचि, योग्यता और कर्म है। ईश्वर ने जाति दी, लेकिन वर्ण चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता मनुष्य को दी।

चार वर्ण = चार प्रकार के कार्य ज्ञान और बौद्धिक कार्य करने वाले ब्राह्मण, रक्षा व शासन में रुचि रखने वाले क्षत्रिय, व्यापार व उत्पादन करने वाले वैश्य, और सहयोगात्मक श्रम करने वाले शूद्र कहलाए।

जन्म से नहीं, आजीविका से पहचान वर्ण किसी की जन्म पहचान नहीं, बल्कि उसके चुने हुए कार्य को दर्शाता है। इसका जाति या ऊँच-नीच से कोई संबंध नहीं है।

पुरुष सूक्त का गलत अर्थ ब्राह्मण को मुख, क्षत्रिय को भुजा, वैश्य को जंघा और शूद्र को पैर कहा गया। इसका अर्थ जन्म नहीं, बल्कि समाज में उनकी भूमिका बताना है।

समाज एक शरीर की तरह जैसे मुख सोचता है, भुजाएँ रक्षा करती हैं, जंघा पोषण देती है और पैर आधार बनते हैं— वैसे ही चारों वर्ण समाज को संतुलित रखते हैं।

वेद जन्म आधारित भेद नहीं मानते वेद ईश्वर को निराकार बताते हैं, इसलिए शरीर से जन्म की कल्पना असंगत है। आत्मा अजन्मा है, उसका कोई जन्मगत वर्ण नहीं होता।

शिक्षा से मिलता है दूसरा जन्म वैदिक संस्कृति में हर व्यक्ति जन्म से शूद्र माना जाता है। शिक्षा प्राप्त करने पर ही ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण मिलता है—इसे द्विज कहा गया।

वर्ण परिवर्तन के ऐतिहासिक प्रमाण सत्यकाम जाबाल, ऐतरेय ऋषि, विश्वामित्र जैसे उदाहरण बताते हैं, कि शूद्र से ब्राह्मण और क्षत्रिय से ब्राह्मण बनना संभव और स्वीकृत था।

शूद्र शब्द अपमानजनक नहीं वेदों में शूद्र शब्द परिश्रमी और कठिन श्रम करने वाले के लिए आया है। कहीं भी शूद्र को अछूत या हीन नहीं कहा गया।

एक जाति – मानव जाति वैदिक समाज पूरे मानव समुदाय को एक ही जाति मानता है। जन्म आधारित भेदभाव वेदों के विरुद्ध है— आज हमें उसी समरस और न्यायपूर्ण समाज को अपनाने की आवश्यकता है।