भारत की आज़ादी की 10 अनसुनी कहानियां: आज़ादी सिर्फ नेताओं की नहीं

भारत की आज़ादी का संघर्ष लंबा, कठिन और बलिदानों से भरा रहा। यह केवल कुछ गिने-चुने बड़े नेताओं की कहानी नहीं है, बल्कि यह देश के हर कोने से उठी आवाज़ों, अनगिनत कुर्बानियों और गुमनाम नायकों की गाथा है। किसान, महिलाएं, बच्चे, मजदूर और आम नागरिक—सबने मिलकर अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी।
जब हम देश आज़ाद होने का जश्न मनाते है, तो यह जरूरी हो जाता है कि हम उन कहानियों को भी याद करें, जो इतिहास की किताबों में कम ही जगह बना पाईं। आइए जानते हैं भारत की आज़ादी से जुड़ी ऐसी ही 10 अनसुनी और प्रेरणादायक कहानियां।
1. पूना पैक्ट से पहले यरवदा जेल की ऐतिहासिक भूख हड़ताल
साल 1932 में ब्रिटिश सरकार ने दलितों के लिए अलग निर्वाचन मंडल (Separate Electorate) की घोषणा की। इस फैसले का महात्मा गांधी ने कड़ा विरोध किया। उनका मानना था कि इससे भारतीय समाज और अधिक विभाजित हो जाएगा। इसी विरोध में गांधीजी ने पुणे की यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया।
वहीं, डॉ. भीमराव अंबेडकर दलितों के राजनीतिक अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए इस व्यवस्था के पक्ष में थे। पूरे देश की निगाहें इस टकराव पर टिक गईं। आखिरकार, दोनों महान नेताओं के बीच समझौता हुआ, जिसे पूना पैक्ट के नाम से जाना गया। इसके तहत दलितों को आरक्षित सीटें मिलीं, लेकिन अलग निर्वाचन मंडल की व्यवस्था खत्म कर दी गई।
2. काकोरी कांड के गुमनाम क्रांतिकारी
काकोरी ट्रेन कांड का नाम आते ही राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और राजेंद्र लाहिड़ी याद आते हैं। लेकिन इस ऐतिहासिक क्रांति में कई ऐसे युवा भी शामिल थे, जिनके नाम इतिहास के पन्नों में खो गए। इन युवाओं ने अंग्रेजी सरकार की आर्थिक रीढ़ तोड़ने के लिए जान की बाजी लगाई। कई को लंबी कैद, यातनाएं और फांसी तक झेलनी पड़ी। बावजूद इसके, उन्हें वह पहचान नहीं मिल सकी जिसके वे हकदार थे।







