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भारतीय इतिहास

Indian Cultural Heritage: गुम होती भारतीय लोककलाएं: जिन हुनरों को बचाने की जरूरत है

भारतीय इतिहास
गुम होती भारतीय लोककलाएं: जिन हुनरों को बचाने की जरूरत है
गुम होती भारतीय लोककलाएं: जिन हुनरों को बचाने की जरूरत है

Indian Cultural Heritage: गुम होती भारतीय लोककलाएं: जिन हुनरों को बचाने की जरूरत है

भारतीय इतिहास

क्यों मनाते हैं रक्षाबंधन?: कृष्ण-द्रौपदी से जुड़ी राखी, इतिहास और महत्व

अवसर
कृष्ण-द्रौपदी से जुड़ी राखी, इतिहास और महत्व
क्यों मनाते हैं रक्षाबंधन?: कृष्ण-द्रौपदी से जुड़ी राखी, इतिहास और महत्व
अवसर
कृष्ण-द्रौपदी से जुड़ी राखी, इतिहास और महत्व

पटेल ने जोड़ा अखंड भारत: भारत के निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका

भारतीय इतिहास
भारत के निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका
पटेल ने जोड़ा अखंड भारत: भारत के निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका
भारतीय इतिहास
भारत के निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका

भारत के सबसे अनोखे गांव: इनमें छिपी है संस्कृति, परंपरा और अनोखी जीवनशैली की पहचान

विशेष साक्षात्कार
इनमें छिपी है संस्कृति, परंपरा और अनोखी जीवनशैली की पहचान
भारत के सबसे अनोखे गांव: इनमें छिपी है संस्कृति, परंपरा और अनोखी जीवनशैली की पहचान
विशेष साक्षात्कार
इनमें छिपी है संस्कृति, परंपरा और अनोखी जीवनशैली की पहचान

राष्ट्रपति भवन के तिरंगे में छिपा है खास संदेश: भवन पर तिरंगा कभी फुल मास्ट तो कभी हाफ मास्ट क्यों?

भारतीय इतिहास
भवन पर तिरंगा कभी फुल मास्ट तो कभी हाफ मास्ट क्यों?
राष्ट्रपति भवन के तिरंगे में छिपा है खास संदेश: भवन पर तिरंगा कभी फुल मास्ट तो कभी हाफ मास्ट क्यों?
भारतीय इतिहास
भवन पर तिरंगा कभी फुल मास्ट तो कभी हाफ मास्ट क्यों?

कालनेमि: एक दैत्य: जिसने सतयुग से कलियुग तक भगवान विष्णु का पीछा नहीं छोड़ा

सनातन धर्म
जिसने सतयुग से कलियुग तक भगवान विष्णु का पीछा नहीं छोड़ा
कालनेमि: एक दैत्य: जिसने सतयुग से कलियुग तक भगवान विष्णु का पीछा नहीं छोड़ा
सनातन धर्म
जिसने सतयुग से कलियुग तक भगवान विष्णु का पीछा नहीं छोड़ा

मक्का: आज का सबसे पवित्र इस्लामी स्थल: इस्लाम से पहले अरब की धार्मिक परंपराओं की कहानी

विशेष साक्षात्कार
इस्लाम से पहले अरब की धार्मिक परंपराओं की कहानी
मक्का: आज का सबसे पवित्र इस्लामी स्थल: इस्लाम से पहले अरब की धार्मिक परंपराओं की कहानी
विशेष साक्षात्कार
इस्लाम से पहले अरब की धार्मिक परंपराओं की कहानी

शिवलिंग क्या है?: जानिए शिवलिंग का वास्तविक अर्थ

विशेष साक्षात्कार
जानिए शिवलिंग का वास्तविक अर्थ
शिवलिंग क्या है?: जानिए शिवलिंग का वास्तविक अर्थ
विशेष साक्षात्कार
जानिए शिवलिंग का वास्तविक अर्थ

नागा साधु बनाम अहमद शाह अब्दाली: जब गोकुल में नागा साधुओं ने रोकी अहमद शाह अब्दाली की सेना

विशेष साक्षात्कार
जब गोकुल में नागा साधुओं ने रोकी अहमद शाह अब्दाली की सेना
नागा साधु बनाम अहमद शाह अब्दाली: जब गोकुल में नागा साधुओं ने रोकी अहमद शाह अब्दाली की सेना
विशेष साक्षात्कार
जब गोकुल में नागा साधुओं ने रोकी अहमद शाह अब्दाली की सेना

26 जनवरी 1950: ब्रिटिश प्रतीकों से आज़ाद होकर अशोक स्तंभ बना राष्ट्रीय चिन्ह

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Indian Cultural Heritage: गुम होती भारतीय लोककलाएं: जिन हुनरों को बचाने की जरूरत है

भारतीय इतिहास
गुम होती भारतीय लोककलाएं: जिन हुनरों को बचाने की जरूरत है
गुम होती भारतीय लोककलाएं: जिन हुनरों को बचाने की जरूरत है

Indian Cultural Heritage: गुम होती भारतीय लोककलाएं: जिन हुनरों को बचाने की जरूरत है

भारत को विविधताओं का देश कहा जाता है। यहां हर क्षेत्र की अपनी बोली, पहनावा, संगीत, नृत्य, चित्रकला, हस्तशिल्प और लोक परंपराएं हैं। गांवों और जनजातीय समुदायों के बीच पीढ़ियों से चली आ रही ये कलाएं सिर्फ मनोरंजन या सजावट का माध्यम नहीं, बल्कि स्थानीय इतिहास, सामाजिक जीवन और सामुदायिक स्मृतियों का हिस्सा हैं। लेकिन बदलती जीवनशैली, बाजार की बदलती मांग और पारंपरिक कलाकारों के सामने रोजगार की चुनौतियों के कारण कई लोककलाओं का अस्तित्व धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है। लोककला का अर्थ केवल नृत्य और गीत नहीं जब हम लोककला की बात करते हैं तो अक्सर लोकनृत्य और लोकगीतों की तस्वीर सामने आती है। लेकिन भारतीय लोक विरासत का दायरा इससे कहीं बड़ा है। पारंपरिक चित्रकला, कठपुतली कला, लोक रंगमंच, वाद्य निर्माण, मिट्टी और धातु के शिल्प, बुनाई, कढ़ाई, पारंपरिक आभूषण और मौखिक कथाओं तक इसका विस्तार है। यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में भारत की कई परंपराएं दर्ज हैं, जिनमें राजस्थान का कालबेलिया, छऊ नृत्य, मणिपुर का संकीर्तन, पंजाब के ठठेरों की पारंपरिक धातु शिल्पकला और केरल का मुदियेट्टू शामिल हैं। यह सूची बताती है कि किसी कला को बचाना सिर्फ कलाकार को बचाना नहीं, बल्कि उससे जुड़ी पूरी सांस्कृतिक स्मृति को सुरक्षित रखना है। कठपुतली और लोक रंगमंच: जब कहानियां मंच पर सांस लेती थीं भारत की पारंपरिक कठपुतली कलाओं ने कभी गांव-गांव घूमकर धार्मिक कथाओं, लोककथाओं और सामाजिक संदेशों को लोगों तक पहुंचाया। राजस्थान की कठपुतली परंपरा इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में दस्ताने की कठपुतलियों, डोरियों और छाया-नाट्य की विविध परंपराएं विकसित हुईं। आज मनोरंजन के आधुनिक साधनों के विस्तार के साथ इन पारंपरिक कलाओं के दर्शक और नियमित मंच दोनों सीमित हुए हैं। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी के लिए इसे पूर्णकालिक पेशे के रूप में अपनाना कठिन होता जा रहा है।

भारतीय इतिहास

क्यों मनाते हैं रक्षाबंधन?: कृष्ण-द्रौपदी से जुड़ी राखी, इतिहास और महत्व

अवसर
कृष्ण-द्रौपदी से जुड़ी राखी, इतिहास और महत्व
क्यों मनाते हैं रक्षाबंधन?: कृष्ण-द्रौपदी से जुड़ी राखी, इतिहास और महत्व

देशभर में आज रक्षाबंधन का त्योहार पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। सावन महीने की पूर्णिमा के अवसर पर मनाया जाने वाला यह पर्व भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसकी लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना करती है, जबकि भाई बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े रहने का संकल्प लेता है। बदलते समय के साथ त्योहार मनाने के तरीके जरूर बदले हैं, लेकिन इसके पीछे छिपी भावनाएं आज भी उतनी ही मजबूत हैं। यही वजह है कि रक्षाबंधन केवल एक पारिवारिक अवसर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में रिश्तों की मजबूती और सामाजिक विश्वास का प्रतीक बन चुका है। राखी का अर्थ क्या है? 'रक्षा बंधन' दो शब्दों से मिलकर बना है—रक्षा और बंधन। रक्षा का अर्थ सुरक्षा और बंधन का अर्थ रिश्तों की डोर से है। इसी भाव के कारण राखी को केवल कलाई पर बांधा जाने वाला धागा नहीं माना जाता, बल्कि इसे प्रेम, विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। पूजा की थाली में राखी के साथ रोली, अक्षत, दीपक और मिठाई रखी जाती है। बहन भाई को तिलक लगाकर आरती उतारती है और उसकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है। भाई भी बहन को उपहार देकर उसके सम्मान और सुरक्षा का संकल्प दोहराता है। इस छोटी सी रस्म के पीछे भाई-बहन के बीच जीवनभर साथ निभाने और एक-दूसरे के सुख-दुख में खड़े रहने की भावना जुड़ी होती है। श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा से जुड़ी मान्यता रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय पौराणिक कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग प्रमुख है। मान्यता के अनुसार, एक अवसर पर भगवान कृष्ण की उंगली में चोट लग गई थी और खून निकलने लगा था। द्रौपदी ने तत्काल अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। इस घटना को दोनों के बीच स्नेह और रक्षा के भाव से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कृष्ण ने द्रौपदी के इस स्नेह का मान रखा और संकट के समय उसकी रक्षा की। महाभारत की यह कथा रक्षाबंधन के भाव को समझाने के लिए आज भी सुनाई जाती है। हालांकि, इसे रक्षाबंधन की ऐतिहासिक उत्पत्ति का प्रमाण नहीं बल्कि इससे जुड़ी एक लोकप्रिय धार्मिक मान्यता के रूप में देखना उचित है। माता लक्ष्मी और राजा बलि की कहानी रक्षाबंधन से जुड़ी दूसरी प्रसिद्ध कथा माता लक्ष्मी और राजा बलि की है। मान्यता के अनुसार, राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उनके पास रहने लगे थे। माता लक्ष्मी भगवान विष्णु को वापस लाने के लिए राजा बलि के पास गईं और उन्होंने उन्हें राखी बांधकर भाई बनाया। इसके बाद उन्होंने उपहार के रूप में भगवान विष्णु को अपने साथ ले जाने की इच्छा व्यक्त की। राजा बलि ने उनकी बात स्वीकार कर ली। इसी कथा को भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम, विश्वास और वचन की शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। इस मान्यता में राखी केवल भाई की कलाई पर बंधने वाला धागा नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों के बीच बने विश्वास और वचन का प्रतीक बन जाती है। इंद्र और शची की कथा भी है महत्वपूर्ण रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य प्राचीन मान्यता देवराज इंद्र और उनकी पत्नी शची से संबंधित है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, देवासुर संग्राम के दौरान इंद्राणी शची ने इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। मान्यता थी कि यह रक्षा कवच उन्हें युद्ध में विजय और सुरक्षा प्रदान करेगा। इसी कारण रक्षा सूत्र को केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं माना जाता। प्राचीन परंपराओं में रक्षा सूत्र का इस्तेमाल किसी प्रिय व्यक्ति की सुरक्षा और मंगलकामना के लिए भी किया जाता रहा है। यही व्यापक भाव आगे चलकर रक्षाबंधन की परंपरा से जुड़ता गया और त्योहार का सामाजिक स्वरूप भी मजबूत हुआ। यम और यमुना की कथा रक्षाबंधन से जुड़ी एक मान्यता मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना के प्रेम से भी जुड़ी है। कथा के अनुसार, यमुना ने अपने भाई यमराज का स्वागत किया और उनके माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु की कामना की। यमराज अपनी बहन के स्नेह से प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया। इस कथा को भाई-बहन के प्रेम और बहन द्वारा भाई की सुख-समृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि रक्षाबंधन को केवल राखी बांधने की रस्म नहीं बल्कि भाई-बहन के बीच भावनात्मक जुड़ाव का पर्व माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इससे जुड़ी कथाओं और परंपराओं में अंतर जरूर मिलता है, लेकिन सभी में स्नेह और रक्षा का भाव प्रमुख रहता है। रानी कर्णावती और हुमायूं की कहानी कितनी ऐतिहासिक है? रक्षाबंधन के इतिहास में रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूं की कहानी भी काफी लोकप्रिय है। प्रचलित कथा के अनुसार, चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने बहादुर शाह के आक्रमण के समय हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी थी। कहा जाता है कि हुमायूं ने राखी का सम्मान करते हुए उनकी सहायता के लिए सेना भेजने का निर्णय लिया। हालांकि, इतिहासकारों के बीच इस घटना के विवरण और इसकी प्रमाणिकता को लेकर मतभेद रहे हैं। इसलिए इसे निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के बजाय एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक कथा और लोकप्रचलित परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है। इसके बावजूद यह कहानी भारतीय समाज में राखी को धार्मिक रिश्ते से आगे बढ़ाकर विश्वास, सम्मान और संरक्षण के प्रतीक के रूप में देखने की भावना को मजबूत करती है। समय के साथ बदलता गया रक्षाबंधन प्राचीन धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भों से निकलकर रक्षाबंधन आज आधुनिक भारतीय समाज का महत्वपूर्ण त्योहार बन चुका है। पहले जहां राखी मुख्य रूप से परिवार और रिश्तेदारों के बीच मनाई जाती थी, वहीं अब लोग दूर रहने वाले भाई-बहनों तक राखी और उपहार पहुंचाने के लिए डाक और ऑनलाइन सेवाओं का सहारा लेते हैं। बाजारों में पारंपरिक धागे से लेकर डिजाइनर, चांदी और बच्चों के लिए कार्टून वाली राखियों तक कई तरह के विकल्प दिखाई देते हैं। मिठाइयों, कपड़ों और उपहारों की खरीदारी भी त्योहार का अहम हिस्सा बन गई है। सोशल मीडिया के दौर में भाई-बहन एक-दूसरे के साथ तस्वीरें और शुभकामना संदेश साझा करते हैं। यानी परंपरा वही है, लेकिन उसे निभाने का तरीका आधुनिक हो गया है।

अवसर
कृष्ण-द्रौपदी से जुड़ी राखी, इतिहास और महत्व

पटेल ने जोड़ा अखंड भारत: भारत के निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका

भारतीय इतिहास
भारत के निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका
पटेल ने जोड़ा अखंड भारत: भारत के निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका

सरदार वल्लभभाई पटेल ने आजादी के बाद देश की एकता और अखंडता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय भारत के सामने सैकड़ों रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करने की बड़ी चुनौती थी। पटेल ने कूटनीति, दृढ़ता और राजनीतिक समझ के जरिए कई रियासतों के विलय का रास्ता तैयार किया। जूनागढ़, हैदराबाद और भोपाल जैसी रियासतों के मामले में उनकी भूमिका बेहद अहम रही। इसी योगदान के कारण उन्हें भारत का लौह पुरुष कहा जाता है। किसान आंदोलनों से मिली सरदार की पहचान सरदार पटेल का नेतृत्व केवल रियासतों के एकीकरण तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में किसानों के लिए भी संघर्ष किया। वर्ष 1918 के खेड़ा सत्याग्रह में उन्होंने किसानों की समस्याओं को मजबूती से उठाया। वर्ष 1928 के बारदोली सत्याग्रह में बढ़े हुए लगान के खिलाफ उन्होंने प्रभावी नेतृत्व किया। उनके नेतृत्व और संगठन क्षमता से प्रभावित होकर बारदोली की महिलाओं ने उन्हें सरदार की उपाधि दी। इसके बाद यही नाम उनकी पहचान बन गया। भोपाल को भारत में शामिल कराने में भूमिका आजादी के समय भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान भारत में विलय को लेकर अलग रुख रखते थे। नवाब भोपाल को स्वतंत्र रखने या पाकिस्तान के साथ जाने की संभावना पर विचार कर रहे थे। सरदार पटेल ने स्थिति को समझते हुए अपने विश्वसनीय सहयोगी वीपी मेनन के जरिए बातचीत आगे बढ़ाई। भोपाल में भारत में विलय के समर्थन में जनदबाव भी बढ़ता गया और अंततः नवाब को अपना रुख बदलना पड़ा। 30 अप्रैल 1949 को विलय पत्र पर हस्ताक्षर के बाद भोपाल भारतीय संघ का हिस्सा बना।

भारतीय इतिहास
भारत के निर्माण में सरदार पटेल की भूमिका

भारत के सबसे अनोखे गांव: इनमें छिपी है संस्कृति, परंपरा और अनोखी जीवनशैली की पहचान

विशेष साक्षात्कार
इनमें छिपी है संस्कृति, परंपरा और अनोखी जीवनशैली की पहचान
भारत के सबसे अनोखे गांव: इनमें छिपी है संस्कृति, परंपरा और अनोखी जीवनशैली की पहचान

भारत को गांवों का देश कहा जाता है और इसकी असली आत्मा गांवों में बसती है। देशभर में लगभग सात लाख से अधिक गांव हैं, जिनमें से कई अपनी अनूठी परंपराओं, रहस्यमयी मान्यताओं, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और आधुनिक विकास मॉडल के कारण पूरी दुनिया में पहचान बना चुके हैं। कहीं बिना दरवाजों वाले घर हैं तो कहीं हर बेटी के जन्म पर सैकड़ों पेड़ लगाए जाते हैं। ये गांव न केवल भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं बल्कि पर्यटन और शोध का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन चुके हैं। शनि शिंगणापुर से मावलिननॉन्ग तक, हर गांव की अपनी अलग कहानी महाराष्ट्र का शनि शिंगणापुर गांव पूरी दुनिया में इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि यहां अधिकांश घरों और कई प्रतिष्ठानों में पारंपरिक दरवाजे नहीं लगाए जाते। स्थानीय लोगों की आस्था है कि भगवान शनिदेव स्वयं गांव की रक्षा करते हैं। वहीं मेघालय का मावलिननॉन्ग वर्ष 2003 से एशिया के सबसे स्वच्छ गांवों में गिना जाता है। यहां स्वच्छता केवल सरकारी अभियान नहीं बल्कि ग्रामीणों की दैनिक जीवनशैली का हिस्सा है। जहां सांप हैं परिवार के सदस्य और संस्कृत है बोलचाल की भाषा महाराष्ट्र का शेतपाल गांव अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है, जहां कई घरों में कोबरा सांपों को नुकसान पहुंचाए बिना रहने दिया जाता है और उन्हें श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है। वहीं कर्नाटक का मत्तूर गांव देश का ऐसा गांव है जहां बड़ी संख्या में लोग आज भी दैनिक जीवन में संस्कृत भाषा का प्रयोग करते हैं। यह गांव भारतीय संस्कृति और प्राचीन भाषा संरक्षण का जीवंत उदाहरण माना जाता है।

विशेष साक्षात्कार
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