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वायरल होने की चाह में खोती संवेदनाएं: कैमरे के सामने हादसे, पीछे छूटती इंसानियत

17 दिसंबर 2025
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कैमरे के सामने हादसे, पीछे छूटती इंसानियत

डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ-साथ उसने संवेदनाओं को भी एक क्लिक की दूरी पर ला खड़ा किया है। आज सोशल मीडिया पर वायरल होना सफलता, पहचान और लोकप्रियता का पैमाना बन चुका है। लाइक्स, व्यूज़ और फॉलोअर्स की गिनती इंसान की काबिलियत तय करने लगी है। लेकिन इस चमकदार दुनिया के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है — मानवीय संवेदनाएं धीरे-धीरे खोती जा रही हैं।

कैमरा पहले, इंसान बाद में
आज अगर कहीं सड़क हादसा हो जाए, किसी की निजी पीड़ा सामने आ जाए या कोई भावनात्मक क्षण घटित हो — तो सबसे पहले मोबाइल कैमरा निकलता है। मदद का हाथ बढ़ाने से पहले वीडियो रिकॉर्ड किया जाता है। किसी के आंसू, डर और बेबसी अब कंटेंट बन चुके हैं। सवाल यह नहीं रह गया कि सामने वाला इंसान कैसा महसूस कर रहा है, सवाल यह है कि वीडियो कितना वायरल होगा।

लाइक्स की भूख और संवेदनाओं की मौत
सोशल मीडिया ने हमें त्वरित प्रतिक्रिया का आदी बना दिया है। एक रील, एक पोस्ट और तुरंत लाइक्स की बाढ़। यह डोपामिन हिट धीरे-धीरे लत में बदल जाती है। लोग भावनाओं को महसूस करने के बजाय उन्हें प्रदर्शन करने लगे हैं। दुख हो तो भी कैमरा ऑन, खुशी हो तो भी फिल्टर के साथ। वास्तविक भावनाएं बनावटी मुस्कानों में खो जाती हैं।
 

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