अभिनव बिंद्रा: जिद और जुनून ने दिलाया गोल्ड: असफलता से सीखकर बने ‘जीत के वैज्ञानिक’

भारतीय खेल इतिहास में अभिनव बिंद्रा का नाम सिर्फ एक ओलंपिक चैंपियन के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच के प्रतीक के रूप में दर्ज है, जिसने भारत में खेल संस्कृति को नई दिशा दी। उनकी कहानी बताती है कि जिद, जुनून और पूर्णता की तलाश कैसे किसी खिलाड़ी को इतिहास रचने वाला बना सकती है।
2008 बीजिंग ओलंपिक: ऐतिहासिक जीत
11 अगस्त 2008, वह दिन जब भारत ने पहली बार ओलंपिक में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीता। बीजिंग ओलंपिक की 10 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में अभिनव बिंद्रा ने गोल्ड मेडल जीतकर न केवल इतिहास रचा, बल्कि देश में खेल क्रांति की शुरुआत कर दी।
जुनून और समर्पण की अनोखी मिसाल
अभिनव बिंद्रा ने कभी भी जीत को संयोग पर नहीं छोड़ा। वे अपने छर्रों का वजन करते थे, उनकी बारीकी से जांच करते थे और सर्वश्रेष्ठ चीनी छर्रों का आयात तक करते थे। उनका मानना था कि जब लक्ष्य ओलंपिक गोल्ड हो, तो हर छोटी चीज मायने रखती है।






