‘री-एडमिशन फीस’ पर सियासत गरम: राघव चड्ढा ने निजी स्कूलों की प्रथा को बताया गलत

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Raghav Chadha ने निजी स्कूलों द्वारा हर साल ली जाने वाली ‘री-एडमिशन फीस’ (Re-admission Fee) को लेकर बड़ा मुद्दा उठाया है। उन्होंने इस प्रथा को अनुचित और अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बताते हुए इसे तुरंत बंद करने की मांग की है।
संसद में इस विषय को उठाते हुए उन्होंने कहा कि जब कोई बच्चा पहले से ही उसी स्कूल में पढ़ रहा है, तो हर साल “दोबारा प्रवेश” के नाम पर फीस लेना पूरी तरह से गलत है और इसे शिक्षा के व्यवसायीकरण का उदाहरण माना जाना चाहिए।
राघव चड्ढा की प्रमुख बातें
अनुचित प्रथा: अगर छात्र पहले से स्कूल में पढ़ रहा है, तो हर साल नया एडमिशन क्यों?
आर्थिक बोझ: इस फीस से माता-पिता पर अनावश्यक आर्थिक दबाव पड़ता है।
जांच और रोक की मांग: सरकार से इस मनमानी पर तुरंत रोक लगाने और नियम बनाने की अपील।
शिक्षा या व्यापार? बड़ा सवाल
यह मुद्दा केवल फीस का नहीं, बल्कि शिक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और नैतिकता का है। आज देश के कई निजी स्कूलों में “री-एडमिशन फीस” के नाम पर हर साल हजारों रुपये वसूले जाते हैं।
सवाल उठता है: अगर बच्चा पहले से उसी स्कूल में पढ़ रहा है, तो हर साल नया एडमिशन किस बात का?
राघव चड्ढा ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि: “शिक्षा सेवा होनी चाहिए, कमाई का जरिया नहीं।”
अभिभावकों की बढ़ती चिंता
देशभर के लाखों अभिभावक इस प्रथा से परेशान हैं। हर साल बढ़ती फीस के साथ-साथ “री-एडमिशन” जैसे अतिरिक्त शुल्क उनकी आर्थिक स्थिति पर असर डालते हैं। मध्यम वर्गीय परिवारों पर सबसे ज्यादा असर, बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है मानसिक दबाव, शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है,
सरकार के सामने चुनौती
अब यह मुद्दा संसद तक पहुंच चुका है, ऐसे में सरकार के सामने बड़ी चुनौती है कि:
क्या इस प्रथा पर कानूनी रोक लगेगी?
क्या निजी स्कूलों के लिए सख्त गाइडलाइन बनाई जाएंगी?
अगर इस पर ठोस कदम उठाए जाते हैं, तो यह देशभर के करोड़ों अभिभावकों को राहत दे सकता है।
“री-एडमिशन फीस” का मुद्दा अब एक राष्ट्रीय बहस बनता जा रहा है। यह सिर्फ एक शुल्क नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का सवाल है।
जब बात बच्चों के भविष्य और माता-पिता की मेहनत की कमाई की हो, तो ऐसे सवाल पूरे सिस्टम को आईना दिखाते हैं।






