नाबालिग की इच्छा सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट ने 7 महीने से अधिक गर्भसमापन की दी अनुमति
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी महिला, खासकर नाबालिग को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि जन्म के बाद बच्चे को गोद दिया जा सकता है, किसी महिला को अवांछित गर्भ ढोने के लिए बाध्य करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सबसे अहम महिला की इच्छा, उसकी गरिमा और उसका मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य है, न कि अजन्मे बच्चे के भविष्य की संभावनाएं। 15 वर्षीय नाबालिग को राहत, 30+ हफ्ते का गर्भ समाप्त करने की अनुमति न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने 15 वर्षीय नाबालिग को 30 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी। अदालत ने माना कि नाबालिग को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना गंभीर मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक आघात पहुंचा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में देरी या इनकार से नाबालिग अवैध और असुरक्षित गर्भपात केंद्रों की ओर रुख कर सकती है, जो और भी खतरनाक हो सकता है। मानसिक स्वास्थ्य और गरिमा को दी प्राथमिकता अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नाबालिग गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रही थी, उसकी पढ़ाई प्रभावित हो रही थी और उसने आत्महत्या के प्रयास जैसे संकेत भी दिए थे। कोर्ट ने टिप्पणी की: “किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर करना, उसके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।” यह भी कहा गया कि प्रजनन से जुड़े फैसले महिला की निजी स्वतंत्रता और निजता का अभिन्न हिस्सा हैं।