निडर चेतना से सनातन समृद्धि तक: भय, अपराधबोध और लोभ से मुक्त चेतना की खोज

यदि मानव की बुद्धिमत्ता भय, अपराधबोध और लोभ से ग्रस्त न हो, तो वह स्वाभाविक रूप से अपनी शाश्वत प्रकृति की खोज की ओर अग्रसर होती है। यही खोज भारतीय सनातन सभ्यता का मूल आधार रही है, जहाँ जीवन को ईश्वर, नर्क या दंड के भय से नहीं, बल्कि सहज चेतना और अस्तित्व के नियमों के अनुरूप जिया गया।
धर्म नहीं, जीवन को सर्वोच्च बनाने की विद्या
सनातन परंपरा में धर्म किसी पंथ या मजहब का नाम नहीं, बल्कि जीवन को सर्वोच्च संभव रूप में जीने की विद्या है। यह विद्या प्रकृति और संस्कृति के योग से उत्पन्न होती है, जिसमें जबरदस्ती नहीं, बल्कि अस्तित्व के नियमों के साथ तालमेल सिखाया जाता है।
पंचमहाभूत और ‘भगवान’ की अवधारणा
भारतीय ज्ञान-तंत्र के अनुसार पंचमहाभूत—भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर—से ही सृष्टि की रचना हुई है। इन्हीं पंच तत्वों के योग को ‘भगवान’ कहा गया। भगवान कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि वही प्रकृति है, जो जीवन को संचालित करती है। भारतीय जीवन-पद्धति में इन्हीं पंचमहाभूतों की पूजा और संतुलन को जीवन का आधार माना गया।
प्रकृति–संस्कृति का संतुलन और भारत की समृद्धि
इतिहास गवाह है कि जब तक भारत में प्रकृति और संस्कृति का संतुलन बना रहा, तब तक भारत विश्व की लगभग 32 प्रतिशत जीडीपी वाला समृद्ध देश था। जैसे-जैसे इस संतुलन में विचलन आया, वैसे-वैसे हमारी आर्थिकी और पारिस्थितिकी दोनों कमजोर होती चली गईं।









