लोहड़ी पर्व: श्रीकृष्ण से दुल्ला भट्टी तक आस्था

लोहड़ी का पर्व हर वर्ष मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है। यह पर्व केवल एक क्षेत्रीय त्योहार नहीं, बल्कि सूर्य, ऋतु परिवर्तन, कृषि और लोकसंस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण भारतीय उत्सव है। मान्यता है कि लोहड़ी का दिन वर्ष का अंतिम दक्षिणायन दिन होता है और इसी रात सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश की तैयारी करते हैं, जिससे उत्तरायण का शुभ काल आरंभ होता है।
सूर्य के उत्तरायण का खगोलीय और आध्यात्मिक महत्व
लोहड़ी उस खगोलीय परिवर्तन का प्रतीक है, जब सूर्य की गति दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर मुड़ती है। इस परिवर्तन के साथ दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। भारतीय परंपरा में इसे शुभ माना गया है, क्योंकि यह नई ऊर्जा, नई चेतना और सकारात्मकता का संकेत देता है।
भगवान श्रीकृष्ण और लोहिता राक्षसी की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने लोहिता नामक राक्षसी का वध किया था, जिसे कंस ने गोकुल भेजा था। श्रीकृष्ण द्वारा लोहिता के संहार के बाद गोकुलवासियों ने प्रसन्न होकर मकर संक्रांति से एक दिन पहले उत्सव मनाया। यही परंपरा आगे चलकर लोहड़ी पर्व के रूप में स्थापित हुई।









