लोहड़ी पर्व: श्रीकृष्ण से दुल्ला भट्टी तक आस्था

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लोहड़ी का पर्व हर वर्ष मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाता है। यह पर्व केवल एक क्षेत्रीय त्योहार नहीं, बल्कि सूर्य, ऋतु परिवर्तन, कृषि और लोकसंस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण भारतीय उत्सव है। मान्यता है कि लोहड़ी का दिन वर्ष का अंतिम दक्षिणायन दिन होता है और इसी रात सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश की तैयारी करते हैं, जिससे उत्तरायण का शुभ काल आरंभ होता है।
सूर्य के उत्तरायण का खगोलीय और आध्यात्मिक महत्व
लोहड़ी उस खगोलीय परिवर्तन का प्रतीक है, जब सूर्य की गति दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर मुड़ती है। इस परिवर्तन के साथ दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं। भारतीय परंपरा में इसे शुभ माना गया है, क्योंकि यह नई ऊर्जा, नई चेतना और सकारात्मकता का संकेत देता है।
भगवान श्रीकृष्ण और लोहिता राक्षसी की पौराणिक कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने लोहिता नामक राक्षसी का वध किया था, जिसे कंस ने गोकुल भेजा था। श्रीकृष्ण द्वारा लोहिता के संहार के बाद गोकुलवासियों ने प्रसन्न होकर मकर संक्रांति से एक दिन पहले उत्सव मनाया। यही परंपरा आगे चलकर लोहड़ी पर्व के रूप में स्थापित हुई।
कृषि से जुड़ा लोहड़ी का गहरा संबंध
लोहड़ी का पर्व कृषि जीवन से भी गहराई से जुड़ा है। इस समय रबी की फसल खेतों में लहलहा रही होती है और खरीफ की फसल घर पहुँच चुकी होती है। किसान सूर्यदेव, धरती और अग्नि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। तिल, गुड़, मूंगफली और नई फसल से बने व्यंजन अग्नि में अर्पित कर सुख-समृद्धि और उत्तम फसल की कामना की जाती है।
दुल्ला भट्टी और सुंदरी–मुंदरी की लोकगाथा
पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में लोहड़ी विशेष उत्साह के साथ मनाई जाती है। यहाँ यह पर्व पंजाब के लोकनायक दुल्ला भट्टी से जुड़ा है, जिन्हें गरीबों का मसीहा माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार, दुल्ला भट्टी ने सुंदरी और मुंदरी नामक दो बहनों को अन्याय से बचाकर उनका विवाह कराया। इसी कारण लोहड़ी के लोकगीतों में आज भी “सुंदर मुंदरिये हो…” गाकर दुल्ला भट्टी को श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है।
अग्नि प्रज्ज्वलन और पारंपरिक रस्में
लोहड़ी की सबसे प्रमुख परंपरा अग्नि प्रज्ज्वलन है। सूर्यास्त के बाद लोग अलाव जलाकर उसकी परिक्रमा करते हैं और उसमें रेवड़ी, गजक, मूंगफली और तिल अर्पित करते हैं। यह अग्नि पवित्रता, ऊर्जा और जीवनशक्ति का प्रतीक मानी जाती है।
भारत की साझा सांस्कृतिक परंपरा में लोहड़ी का स्थान
भारत के विभिन्न हिस्सों में सूर्योपासना अलग-अलग पर्वों के रूप में मनाई जाती है—दक्षिण भारत में पोंगल, असम में माघ बिहू, बंगाल में संक्रांति और उत्तर भारत में मकर संक्रांति। लोहड़ी उसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो क्षेत्रीय विविधता के बीच सांस्कृतिक एकता को दर्शाती है।
आधुनिक समय में लोहड़ी का सामाजिक संदेश
आज के दौर में, जब जीवन भागदौड़ और तनाव से भरा हुआ है, लोहड़ी सामूहिकता, प्रकृति से जुड़ाव और सामाजिक एकता का संदेश देती है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि साझा उत्सव और परंपराएँ समाज को जोड़ने का सबसे सशक्त माध्यम हैं।
सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक लोहड़ी
अंततः लोहड़ी केवल आग जलाने या मिठाइयाँ खाने का पर्व नहीं है। यह सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव, किसान की मेहनत का सम्मान, लोकनायकों की स्मृति और भारतीय सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है, जो आज भी उसी जोश और उमंग के साथ मनाया जाता है।









