नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती: वह धरती जहाँ से आज़ादी की जंग को मिली नई दिशा

आज 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर देश उनके अदम्य साहस और क्रांतिकारी विरासत को नमन कर रहा है। इस अवसर पर झारखंड से उनके गहरे और ऐतिहासिक जुड़ाव को भी याद किया जा रहा है, जहाँ 1928 से 1941 के बीच उन्होंने जमशेदपुर, धनबाद, रामगढ़ और रांची जैसे क्षेत्रों में स्वतंत्रता संग्राम और मजदूर आंदोलनों को नई दिशा दी। रामगढ़ की ‘एंटी-कॉम्प्रोमाइज कॉन्फ्रेंस’ से लेकर गोमो स्टेशन से हुआ उनका ऐतिहासिक पलायन, नेताजी की यह धरती अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष की साक्षी बनी। झारखंड में मौजूद उनके स्मारक आज भी उनकी निडर सोच, त्याग और राष्ट्रभक्ति की कहानी कहते हैं।
इन यात्राओं का उद्देश्य केवल भाषण देना नहीं था, बल्कि मजदूर आंदोलनों को संगठित करना और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनचेतना फैलाना था।
मजदूर आंदोलनों और ‘एंटी-कॉम्प्रोमाइज कॉन्फ्रेंस’ की भूमिका
रामगढ़ में आयोजित ‘एंटी-कॉम्प्रोमाइज कॉन्फ्रेंस’ नेताजी की क्रांतिकारी सोच का प्रतीक रही। वे समझौते की राजनीति के खिलाफ थे और मानते थे कि बिना निर्णायक संघर्ष के आज़ादी संभव नहीं। यही वजह थी कि मजदूर यूनियन लीडर्स और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े नेता लगातार उनके संपर्क में रहते थे।









