मोहन भागवत का बड़ा बयान: “दुनिया विनाश की ओर, भारत ही ला सकता है शांति”

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान वैश्विक हालात पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि आज दुनिया युद्ध, स्वार्थ और अस्थिरता की ओर बढ़ रही है, जबकि भारत तेजी से उत्थान की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भागवत के मुताबिक, वैश्विक संघर्षों के बीच भारत ही ऐसा देश है जो दुनिया को एकजुट कर सकता है और शांति स्थापित कर सकता है।
वैश्विक संकट और भारत की भूमिका
मोहन भागवत ने पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और ईरान पर अमेरिका व इजरायल के हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि इन घटनाओं ने दुनिया में अस्थिरता बढ़ा दी है। तेल और गैस की आपूर्ति को लेकर संकट गहराता जा रहा है, वहीं ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर भारी टोल लगाने की योजना से अंतरराष्ट्रीय चिंता और बढ़ गई है।
उन्होंने कहा कि इन हालात में कई देश भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं, क्योंकि भारत के सभी पक्षों से संतुलित संबंध हैं।
“दुनिया को जोड़ने की ताकत सिर्फ भारत के पास”
भागवत ने अपने संबोधन में कहा: “दुनिया जड़ हो गई है, लेकिन उसे जोड़ने वाला तत्व केवल भारत के पास है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का दर्शन “एकता और परस्पर जुड़ाव” पर आधारित है, जो वैश्विक शांति का आधार बन सकता है।
युद्ध का कारण: स्वार्थ और वर्चस्व
संघ प्रमुख ने कहा कि आज के युद्ध किसी धर्म या न्याय के लिए नहीं, बल्कि स्वार्थ और वर्चस्व की लड़ाई हैं।
“मेरे पास नहीं है, तो मैं वहां से लाऊंगा” – यही मानसिकता संघर्ष की जड़,
धार्मिक असहिष्णुता, जबरन धर्मांतरण और ऊंच-नीच की सोच अभी भी कायम,
2000 वर्षों से संघर्ष खत्म करने के प्रयास जारी, लेकिन समाधान अधूरा
“भारत ही रोक सकता है युद्ध” – वैश्विक विश्वास
मोहन भागवत ने दावा किया कि दुनिया के कई देश मानते हैं कि भारत ही पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध को समाप्त कर सकता है।
उन्होंने कहा कि: भारत के अमेरिका, इजरायल और ईरान से अच्छे संबंध हैं, संयुक्त अरब अमीरात और फिनलैंड जैसे देश भारत से हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे हैं, “भारत की प्रवृत्ति को दुनिया समझती है, इसलिए समाधान की उम्मीद हमसे है”
मानवता बनाम जंगल का कानून
भागवत ने भारत और दुनिया की सोच में अंतर बताते हुए कहा: भारत “मानवता के कानून” पर चलता है, जबकि दुनिया “जंगल के कानून” का पालन करती है, बिना शक्ति के कोई किसी की बात नहीं मानता, उन्होंने कहा कि भारत को पहले खुद को मजबूत और संगठित करना होगा, तभी वह दुनिया में संतुलन स्थापित कर पाएगा।
धर्म और जीवन का संबंध
RSS प्रमुख ने कहा कि धर्म केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे दैनिक जीवन में अपनाना जरूरी है।
सच्चा धर्म = आचरण + अनुशासन + एकता,
स्थायी शांति सत्ता से नहीं, बल्कि सद्भाव से आती है,
मोहन भागवत का यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया कई मोर्चों पर संघर्ष और अस्थिरता का सामना कर रही है। ऊर्जा संकट, युद्ध और वैश्विक तनाव के बीच भारत की भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय उम्मीदें बढ़ती नजर आ रही हैं।
अगर भारत अपनी परंपरागत “वसुधैव कुटुंबकम” की सोच को प्रभावी तरीके से लागू करता है, तो वह वैश्विक शांति में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।








