रुपया कमजोर, डॉलर के मुकाबले बड़ी गिरावट: RBI क्यों नहीं कर रहा हस्तक्षेप?

RBI क्यों नहीं कर रहा हस्तक्षेप?

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भारतीय मुद्रा रुपया एक बार फिर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता नजर आ रहा है। हाल ही में रुपया ऐतिहासिक रूप से ₹90 प्रति डॉलर के नीचे फिसल गया, जिससे शेयर बाजार और निवेशकों में हलचल मच गई। हालांकि बुधवार को इसमें हल्का सुधार देखा गया, लेकिन बाजार में चिंता अभी भी बनी हुई है।

रुपये की गिरावट के बीच जहां निवेशक और आयातक परेशान हैं, वहीं मार्केट एक्सपर्ट और Sense and Simplicity के फाउंडर व CEO सुनील सुब्रमण्यम ने इस गिरावट को लेकर बड़ा बयान दिया है। उनका मानना है कि रुपये में गिरावट किसी कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि एक सोची-समझी आर्थिक रणनीति है।

एक्सपर्ट की राय: ‘₹100 तक जा सकता है रुपया’
जागरण बिजनेस से एक्सक्लूसिव बातचीत में सुनील सुब्रमण्यम ने कहा कि
“रुपये का कमजोर होना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक नहीं, बल्कि लंबे समय में फायदेमंद हो सकता है। आने वाले समय में रुपया ₹100 प्रति डॉलर के स्तर को भी छू सकता है।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जानबूझकर अभी दखल नहीं दे रहा है, क्योंकि रुपये का कमजोर होना अमेरिकी टैरिफ के दबाव को काउंटर करने का सबसे बड़ा हथियार बन सकता है।

RBI क्यों नहीं कर रहा हस्तक्षेप?
एक्सपर्ट के मुताबिक, RBI सिर्फ रुपये-डॉलर के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि एक्सपोर्ट-इंपोर्ट, क्रूड ऑयल कीमत, विदेशी मुद्रा भंडार, व्यापार घाटा, जैसे कई फैक्टर्स को ध्यान में रखकर फैसला लेता है। RBI के पास करीब 700 बिलियन डॉलर का फॉरेक्स रिजर्व है, और जब जरूरत होगी तब वह बाजार में हस्तक्षेप जरूर करेगा।

रुपये के कमजोर होने के दो बड़े कारण
गोल्ड ETF में भारी निवेश,
गोल्ड ETF में निवेश डॉलर में होता है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है।
India-US Trade Deal और टैरिफ,
अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी और ट्रेड डील को लेकर अनिश्चितता भी रुपये की गिरावट की बड़ी वजह है।

आम जनता पर क्या होगा असर?
रुपये की गिरावट से:
कच्चा तेल और ईंधन महंगा होगा,
उर्वरक आयात की लागत बढ़ेगी,
इलेक्ट्रॉनिक्स, स्मार्टफोन, AC, TV के दाम बढ़ सकते हैं,
विदेश में पढ़ने वाले छात्रों की फीस और खर्च बढ़ेगा,
एयरलाइंस, EVs और प्रीमियम कारें महंगी हो सकती हैं,

निर्यातकों के लिए राहत की खबर
दूसरी ओर, कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए वरदान साबित हो सकता है।
IT और फार्मा सेक्टर को फायदा,
अमेरिकी टैरिफ के बावजूद एक्सपोर्ट होगा प्रतिस्पर्धी,
विदेशी रेमिटेंस में बढ़ोतरी की संभावना,
FY25 में भारत को रिकॉर्ड 135.5 बिलियन डॉलर का रेमिटेंस मिला था, जो आगे और बढ़ सकता है।

रुपये की गिरावट का इतिहास
1966: ₹4.76 से ₹7.50,
1991: ₹21 से ₹26 (उदारीकरण),
2008: वैश्विक मंदी, ₹51 के पार,
2013: ₹68.80 तक गिरावट,
2025-26: ट्रंप की वापसी और टैरिफ युद्ध के बाद ₹90 के पार,

रुपये की गिरावट जहां आयात को महंगा बनाएगी, वहीं निर्यात, IT, फार्मा और रेमिटेंस जैसे सेक्टर्स को मजबूती दे सकती है। यानी यह गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती और अवसर—दोनों लेकर आई है।

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