योगिनी एकादशी 2026: तिथि को लेकर दुविधा दूर

Taushif Shekh
0 सेकंड पहलेYeh toh planets ki chaal ka hi asar hai!
Aditya Verma
0 सेकंड पहलेDharm aur aastha hi insaan ko sahi raah dikhati hai.
Dev Kapoor
2 घंटे पहलेIshwar ki leela ko koi nahi samjha sakta.
Pranav Srivastava
3 घंटे पहलेAaj ka din bahut mahatvapurna raha jyotish ke hisaab se.
Sneha Menon
4 घंटे पहलेSpirituality hi asli shakti hai is duniya mein.
Kabir Shukla
6 घंटे पहलेAaj ka din bahut mahatvapurna raha jyotish ke hisaab se.
सनातन धर्म में एकादशी व्रत का बहुत ही खास और पवित्र महत्व माना गया है। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को 'योगिनी एकादशी' के नाम से जाना जाता है। यह पावन तिथि भगवान विष्णु के योगेश्वर स्वरूप की पूजा-आराधना के लिए समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के समस्त पाप, रोग और कष्ट दूर हो जाते हैं। पद्मपुराण के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जातक के सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
तिथि को लेकर दुविधा और शास्त्रीय नियम
इस वर्ष वर्ष 2026 में योगिनी एकादशी की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं के बीच थोड़ी दुविधा बनी हुई है, क्योंकि 10 और 11 जुलाई दोनों ही दिन एकादशी तिथि सूर्योदय काल में पूर्ण रूप से व्याप्त नहीं हो रही है। पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि का आरंभ 10 जुलाई, शुक्रवार को सुबह 08:16 बजे (कुछ गणनाओं में सुबह 08:10 बजे) होगा और इसका समापन 11 जुलाई, शनिवार को सुबह 05:22 बजे हो जाएगा।
चूंकि 11 जुलाई को सूर्योदय से पहले ही एकादशी समाप्त होकर द्वादशी तिथि लग रही है, इसलिए शास्त्रों के नियम के अनुसार जब दोनों दिन सूर्योदय काल में एकादशी न हो, तो पहले दिन ही व्रत रखना सर्वमान्य होता है। इसी नियम के आधार पर गृहस्थ लोगों के लिए 10 जुलाई 2026, शुक्रवार को योगिनी एकादशी का व्रत रखना मान्य होगा, जबकि वैष्णव संप्रदाय से जुड़े लोग 11 जुलाई को यह व्रत रख सकते हैं।
योगिनी एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त और पारण का समय
पंचांग के अनुसार योगिनी एकादशी से जुड़े महत्वपूर्ण समय इस प्रकार हैं:
एकादशी तिथि प्रारंभ: 10 जुलाई 2026, सुबह 08:16 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त: 11 जुलाई 2026, सुबह 05:22 बजे तक
मुख्य पूजा तिथि (गृहस्थ): 10 जुलाई 2026 (शुक्रवार)
व्रत पारण का शुभ समय: 11 जुलाई 2026 (शनिवार), सुबह 05:50 बजे से 08:35 बजे तक
हरि वासर समाप्ति का समय: 11 जुलाई 2026, सुबह 09:10 बजे
निर्जला एकादशी से संबंध और धार्मिक महत्व
योगिनी एकादशी से ठीक पहले जेठ मास में निर्जला एकादशी (वर्ष 2026 में 25 जून) मनाई गई, जिसे सभी एकादशियों का फल देने वाला माना जाता है। इसके बाद आने वाली योगिनी एकादशी का महत्व और बढ़ जाता है। आषाढ़ मास की यह एकादशी विशेष रूप से आरोग्य (अच्छे स्वास्थ्य), सुंदर रूप, गुण और यश प्रदान करने वाली मानी जाती है। इसके ठीक बाद देवशयनी एकादशी आती है, जिससे चातुर्मास का शुभारंभ होता है। इस प्रकार यह व्रत आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करने वाली अंतिम कड़ियों में से एक है।
योगिनी एकादशी पूजा के मुख्य लाभ
- पापों से मुक्ति: मान्यता है कि विधि-विधान से पूजा करने पर व्यक्ति के इस जन्म और पूर्व जन्म के सभी ज्ञात-अज्ञात पापों का नाश होता है।
- रोगों का निवारण: शारीरिक और मानसिक व्याधियों से परेशान लोगों के लिए यह व्रत अत्यंत लाभकारी और आरोग्य प्रदान करने वाला माना गया है।
- सुख-समृद्धि और मोक्ष: भगवान विष्णु की कृपा से परिवार में शांति बनी रहती है, रुके हुए कार्यों में सफलता मिलती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।
योगिनी एकादशी की प्रामाणिक व्रत और पूजा विधि
योगिनी एकादशी व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि की रात से ही शुरू हो जाता है। दशमी के दिन सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए तथा रात के समय मूंग, मसूर, गेहूं, जौ और बैंगन जैसी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि करें और साफ-सुथरे वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थान पर कलश स्थापित कर भगवान विष्णु की प्रतिमा को प्रतिष्ठित करें। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करते हुए भगवान को वस्त्र, चंदन, जनेऊ, अक्षत, पीले पुष्प, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें। पूजा में तुलसी दल और पंचामृत का विशेष रूप से उपयोग करें। पूजा के दौरान विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना और अंत में आरती उतारना बेहद शुभ फलदायी माना जाता है।
व्रत के दौरान ध्यान रखने योग्य विशेष नियम
तुलसी दल पहले ही तोड़ लें: एकादशी और द्वादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित होता है, इसलिए पूजा के लिए एक दिन पहले (दशमी को) ही तुलसी दल तोड़कर रख लें।
चावल का सेवन निषेध: एकादशी के दिन परिवार के किसी भी सदस्य को भूलकर भी चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।
मानसिक सात्विकता: इस दिन क्रोध, झूठ, निंदा और नकारात्मक विचारों से दूरी बनाकर रखें तथा दान-पुण्य के कार्यों में हिस्सा लें।








