करोड़ों का मुआवजा: कुछ सालों में खत्म

Pooja Reddy
1 महीने पहलेHum is cause ke saath hain, awaaz uthani chahiye.
Aarav Sharma
1 महीने पहलेYeh sab dekh ke bahut dukh hota hai.
Kavya Mishra
1 महीने पहलेYeh mamla sabke saath ho sakta hai, jaagrukata zaroori.
Saanvi Pandey
1 महीने पहलेSamaj ke liye is khabar ka bahut mahatva hai.
Anika Rajput
1 महीने पहलेAise logon ko support karna humara farz hai.
Ritika Ghosh
1 महीने पहलेHum is cause ke saath hain, awaaz uthani chahiye.
उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा क्षेत्र से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो विकास और मुआवजे के मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जिन किसान परिवारों को कभी करोड़ों रुपए का मुआवजा मिला था और जिन्हें लगा था कि अब उनकी आने वाली पीढ़ियां आरामदायक जीवन जिएंगी, आज वही परिवार रोज़मर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आलीशान मकान, महंगी गाड़ियां और शानो-शौकत में खर्च की गई रकम कुछ ही सालों में खत्म हो गई और अब स्थिति यह है कि कई किसान अपनी ही जमीन पर बनी इमारतों में नौकरी करने को मजबूर हैं।
रामेश्वर सिंह की कहानी: करोड़ों से कर्ज तक का सफर
ग्रेटर नोएडा के 90 वर्षीय किसान रामेश्वर सिंह को 12 एकड़ जमीन के बदले करीब सवा 5 करोड़ रुपए का मुआवजा मिला था। इतनी बड़ी रकम मिलने के बाद उन्होंने गांव में आलीशान मकान बनवाए, महंगी गाड़ियां खरीदीं और परिवार की शादियों में जमकर खर्च किया। बताया जाता है कि एक-एक शादी में 80 लाख रुपए तक खर्च हुए। लेकिन आज रामेश्वर सिंह खुद स्वीकार करते हैं कि उन्हें पैसे को संभालने और निवेश करने का सही ज्ञान नहीं था, जिसके चलते अधिकतर मुआवजा खत्म हो चुका है और परिवार आर्थिक तंगी में जी रहा है।
हजारों किसानों की एक जैसी कहानी
यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं है। ग्रेटर नोएडा के 39 से अधिक गांवों में 2007 से 2012 के बीच हजारों किसानों की जमीन अधिग्रहित की गई थी। उस समय करोड़ों रुपए का मुआवजा दिया गया, लेकिन आज अधिकांश परिवारों की हालत खराब हो चुकी है। न तो कोई स्थायी आय का साधन बचा और न ही भविष्य के लिए कोई योजना बनाई गई।
छोटे उदाहरण, बड़ी सीख
श्याम सिंह बताते हैं कि उन्हें 17 बीघा जमीन के बदले 50 लाख रुपए मिले थे, जो उस समय बहुत बड़ी रकम लग रही थी। लेकिन आज उनका एक बेटा केवल 25 हजार रुपए की नौकरी करता है, जबकि दूसरा उन्हीं सोसायटियों में दूध बेचता है, जो कभी उनकी जमीन पर बनी थीं।
वहीं, रमेश नाम के किसान को 8-10 बीघा जमीन के बदले 14 लाख रुपए मिले। उन्होंने घर बनवाया और बेटियों की शादी कर दी। कुछ ही समय में पैसा खत्म हो गया और आज उन पर 7 लाख रुपए का कर्ज है। उनका परिवार अब भैंस पालन और दूध बेचकर गुजर-बसर कर रहा है। रमेश कहते हैं कि कभी-कभी दवाइयों के पैसे मांगने पर भी बच्चों के चेहरे बदल जाते हैं।
सबसे बड़ी गलती: योजना की कमी और दिखावा
कई किसानों का मानना है कि सबसे बड़ी गलती यह रही कि उन्होंने मुआवजे की रकम को भविष्य की योजना के बजाय दिखावे और सामाजिक दबाव में खर्च कर दिया। बड़े घर, महंगी गाड़ियां और शादियों की भव्यता ने कुछ सालों तक खुशी जरूर दी, लेकिन स्थायी आय का कोई साधन नहीं बचा।
विकास या विस्थापन?
आज हालात ऐसे हैं कि जिन खेतों ने कभी इन परिवारों को पहचान दी थी, उन्हीं जमीनों पर बनी फैक्ट्रियों और टावरों के नीचे उनकी अगली पीढ़ी छोटी-छोटी नौकरियां कर रही है। ग्रेटर नोएडा के गांवों में बैठे किसान अब एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या विकास का मतलब अपनी जड़ों से कट जाना होता है?






