Global Warming Alert: क्लाइमेट फीडबैक लूप ने बढ़ाई चुनौती

Ada khan
8 घंटे पहलेJai Hind! Desh pahle, baaki sab baad mein.
Kavya Mishra
10 घंटे पहलेJai Hind! Desh pahle, baaki sab baad mein.
Riya Jain
10 घंटे पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Pranav Srivastava
11 घंटे पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Anika Rajput
12 घंटे पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Krishna Yadav
12 घंटे पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Vivaan Gupta
14 घंटे पहलेBharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.
Simran Arora
15 घंटे पहलेJai Hind! Desh pahle, baaki sab baad mein.
Ada khan
15 घंटे पहलेBharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.
दुनिया में बढ़ते तापमान को लेकर वैज्ञानिकों और जलवायु संस्थाओं की चिंता लगातार बढ़ रही है। यूरोपीय संघ की Copernicus Climate Change Service के मुताबिक अगस्त 2026 वैश्विक स्तर पर रिकॉर्ड का सबसे गर्म अगस्त रहा और औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.65°C ऊपर दर्ज किया गया। अगस्त 2026 जुलाई 2023 के साथ अब तक का संयुक्त रूप से सबसे गर्म महीना भी रहा। वैज्ञानिकों के अनुसार इस गर्मी में इंसानी गतिविधियों से बढ़ रहा दीर्घकालिक तापमान और प्रशांत महासागर में मजबूत हो रहा El Niño दोनों महत्वपूर्ण कारक हैं।
1.5°C की सीमा पार होने का खतरा
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी UNEP की 2 सितंबर 2026 को जारी Limiting Overshoot रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि आने वाले कुछ वर्षों में 1.5°C की सीमा को पार कर सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक 1.5°C से ऊपर जाने के साथ अत्यधिक मौसम, ग्लेशियरों के पिघलने, समुद्र स्तर बढ़ने और पारिस्थितिक तंत्र पर दबाव जैसे जोखिम बढ़ते जाएंगे। हालांकि UNEP ने यह भी स्पष्ट किया है कि तेज और लगातार उत्सर्जन कटौती के जरिए तापमान के ओवरशूट को सीमित करना और बाद में इसे फिर 1.5°C से नीचे लाना अभी भी संभव है।
मजबूत El Niño से मौसम पर असर
प्रशांत महासागर में El Niño की स्थिति अब मजबूत हो रही है और वैज्ञानिक आकलनों में इसे आने वाले महीनों में बेहद मजबूत घटना बनने की संभावना जताई गई है। Copernicus के अनुसार अगस्त में उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के समुद्री सतह तापमान में रिकॉर्ड स्तर की गर्मी दर्ज हुई और El Niño के और मजबूत होने के संकेत मिले हैं। WMO ने भी कहा है कि इसका प्रभाव बारिश और तापमान के पैटर्न पर 2027 तक पड़ सकता है। हालांकि “Super El Niño” की तीव्रता और उसके अंतिम प्रभावों को लेकर पूर्वानुमान में अनिश्चितता बनी हुई है।
क्लाइमेट फीडबैक लूप से बढ़ सकता है तापमान
हालिया वैज्ञानिक अध्ययन ने जलवायु के प्राकृतिक फीडबैक लूप को लेकर भी चिंता बढ़ाई है। अध्ययन के मुताबिक बढ़ते तापमान के कारण पर्माफ्रॉस्ट, जंगल, आर्द्रभूमि और झीलों जैसे प्राकृतिक तंत्र अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन छोड़ सकते हैं। इससे ग्लोबल वार्मिंग और तेज हो सकती है। अध्ययन का अनुमान है कि सदी के अंत तक ये प्राकृतिक फीडबैक मानव गतिविधियों से होने वाली गर्मी को लगभग 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार मौजूदा जलवायु मॉडल इन अतिरिक्त उत्सर्जनों को पूरी तरह शामिल नहीं करते, जिससे भविष्य के जोखिम कम आंके जाने की संभावना हो सकती है।
चरम मौसम की घटनाओं का बढ़ता खतरा
बढ़ते वैश्विक तापमान का असर केवल गर्मी तक सीमित नहीं है, बल्कि मौसम की चरम घटनाओं के जोखिम को भी प्रभावित करता है। UNEP के अनुसार 1.5°C से ऊपर हर अतिरिक्त तापमान वृद्धि के साथ जलवायु जोखिम बढ़ते हैं। इसमें अत्यधिक गर्मी, भारी बारिश, सूखा, ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्र स्तर बढ़ने जैसी घटनाएं शामिल हैं। हालांकि किसी एक बाढ़, बादल फटने या सूखे की घटना को सीधे किसी एक जलवायु कारण से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होता, लेकिन गर्म होती जलवायु इन चरम घटनाओं की तीव्रता और जोखिम को बढ़ा सकती है।
उत्सर्जन घटाना ही सबसे बड़ा समाधान
वैज्ञानिक संस्थाओं और संयुक्त राष्ट्र की चेतावनियों का मुख्य संदेश यह है कि जलवायु संकट को सीमित करने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेज और लगातार कटौती जरूरी है। UNEP की नई रिपोर्ट के अनुसार 1.5°C का अस्थायी ओवरशूट अब बेहद संभावित है, लेकिन उसका स्तर और अवधि अभी भी मानव कार्रवाई पर निर्भर कर सकती है। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने, मीथेन उत्सर्जन कम करने, स्वच्छ ऊर्जा बढ़ाने और कार्बन हटाने की दीर्घकालिक रणनीतियों से तापमान वृद्धि को सीमित किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हर छोटी तापमान वृद्धि को रोकना भी भविष्य के नुकसान और जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण होगा।







