Sarva Pitru Amavasya 2026: सर्वपितृ अमावस्या आज, जानें श्राद्ध और तर्पण का शुभ मुहूर्त

Ritika Ghosh
4 दिन पहलेRishiyon ne sadi pehle hi inka jikr kiya tha.
Anika Rajput
4 दिन पहलेAaj ka din bahut mahatvapurna raha jyotish ke hisaab se.
Sonu rai
4 दिन पहलेIshwar ki leela ko koi nahi samjha sakta.
Sonu rai
4 दिन पहलेRishiyon ne sadi pehle hi inka jikr kiya tha.
Nisha Shah
4 दिन पहलेRishiyon ne sadi pehle hi inka jikr kiya tha.
Kavya Mishra
4 दिन पहलेGraha nakshatra sab kuch pehle se bata dete hain.
Diya Gupta
4 दिन पहलेDharm aur aastha hi insaan ko sahi raah dikhati hai.
Arjun Singh
4 दिन पहलेDharm aur aastha hi insaan ko sahi raah dikhati hai.
सर्वपितृ अमावस्या 2026: पितृपक्ष का अंतिम दिन आज
10 अक्टूबर 2026, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसे पितृपक्ष का अंतिम दिन माना जाता है। इसे महालया अमावस्या और विसर्जनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन पूर्वजों की स्मृति में श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य करने की परंपरा है। मान्यता है कि जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, वे भी इस दिन उनके निमित्त श्राद्ध और तर्पण कर सकते हैं। इस अवसर पर परिवार अपने पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है और उनकी शांति तथा सुख-समृद्धि की प्रार्थना करता है।
सर्वपितृ अमावस्या की तिथि और श्राद्ध का शुभ समय
दिए गए पंचांग विवरण के अनुसार, अमावस्या तिथि 10 अक्टूबर 2026 को सुबह 7:22 बजे शुरू होकर 11 अक्टूबर को सुबह 5:28 बजे तक रहेगी। श्राद्ध और तर्पण के लिए बताए गए प्रमुख समय इस प्रकार हैं:
- कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक।
- रोहिण मुहूर्त: दोपहर 12:31 बजे से 1:17 बजे तक।
- अपराह्न काल: दोपहर 1:18 बजे से 3:37 बजे तक।
धार्मिक परंपराओं में इन समयों को श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। अलग-अलग स्थानों पर सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त में अंतर हो सकता है, इसलिए पूजा करने से पहले स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि कर लेना उचित है।
सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध और तर्पण की विधि
धार्मिक परंपरा के अनुसार, इस दिन स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्राद्ध का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद निर्धारित समय में जल, कुश और काले तिल के माध्यम से पितरों के निमित्त तर्पण किया जाता है। विधि परिवार की परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। श्राद्ध कर्म करते समय श्रद्धा, शुद्धता और पूर्वजों के प्रति सम्मान को विशेष महत्व दिया जाता है।
पंचबलि, भोजन और दान-पुण्य का महत्व
परंपरागत श्राद्ध विधि में भोजन का कुछ अंश गाय, कुत्ते, कौए और अन्य जीवों के लिए निकालने की मान्यता है। इसे पंचबलि की परंपरा से जोड़ा जाता है। इसके बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना तथा अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान करना पुण्यकारी माना जाता है। इन कार्यों का उद्देश्य पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना और समाज में सेवा तथा दान की भावना को बढ़ावा देना है।
दीपदान और पूर्वजों के स्मरण की परंपरा
सर्वपितृ अमावस्या पर कई परिवार शाम के समय दीपक जलाकर अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं। कुछ परंपराओं में घर के मुख्य द्वार या पीपल के वृक्ष के पास दीपदान किया जाता है। इसे श्रद्धा और प्रार्थना का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किया गया श्राद्ध, तर्पण और दान पूर्वजों के प्रति सम्मान प्रकट करने का माध्यम है। इन मान्यताओं को आस्था और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए।
सर्वपितृ अमावस्या का धार्मिक महत्व
पितृपक्ष के समापन पर आने वाली सर्वपितृ अमावस्या को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर माना जाता है। इस दिन लोग अपने परिवार की परंपराओं के अनुसार श्राद्ध, तर्पण, प्रार्थना और दान-पुण्य करते हैं। यदि आप भी श्राद्ध कर्म करना चाहते हैं, तो स्थानीय पंचांग में दिए गए समय और अपने परिवार की परंपरा का पालन करें। धार्मिक विधियों और मुहूर्त से जुड़ी जानकारी अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती है।








