उत्तराखंड का इतिहास 8300 साल पुरानी मानव सभ्यता: IIT रुड़की की खोज ने बदला इतिहास

IIT रुड़की की खोज ने बदला इतिहास
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Kabir Shukla

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0 सेकंड पहले

Desh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.

Trapti Tanwar

Trapti Tanwar

0 सेकंड पहले

Desh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.

Pranav Srivastava

Pranav Srivastava

0 सेकंड पहले

Is niti se desh ka bhala hoga ya nahi — debate honi chahiye.

Diya Gupta

Diya Gupta

0 सेकंड पहले

India ki progress dekh ke dil khush ho gaya!

Tanya Bajaj

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0 सेकंड पहले

Is niti se desh ka bhala hoga ya nahi — debate honi chahiye.

Monika Das

Monika Das

0 सेकंड पहले

Desh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.

Anjali Patil

Anjali Patil

0 सेकंड पहले

Is decision ka poore desh par seedha asar padega.

Monika Das

Monika Das

0 सेकंड पहले

Hamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.

Taushif Shekh

Taushif Shekh

0 सेकंड पहले

Is decision ka poore desh par seedha asar padega.

Ada khan

Ada khan

0 सेकंड पहले

Bharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.

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उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय से एक ऐसी वैज्ञानिक खोज सामने आई है जिसने प्रदेश के प्राचीन इतिहास की समय-सीमा को हजारों वर्ष पीछे पहुंचा दिया है। IIT रुड़की के वैज्ञानिकों ने चमोली जिले के टोली ताल क्षेत्र में किए गए अध्ययन में 8300 वर्ष पहले मानव बसावट के प्रमाण मिलने का दावा किया है। इस शोध से संकेत मिलता है कि उस समय यहां रहने वाले लोग केवल शिकारी नहीं थे, बल्कि खेती, मिट्टी के बर्तन बनाने और धातुओं के उपयोग जैसी गतिविधियों से भी परिचित थे।


सेडीमेंट्री डीएनए तकनीक से खुला हजारों साल पुराना रहस्य
आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिकों ने टोली ताल झील की तलहटी से मिट्टी के कोर सैंपल एकत्र किए और उन पर आधुनिक Sedimentary Ancient DNA (sedDNA) तथा Shotgun Metagenomics तकनीक के माध्यम से अध्ययन किया।शोध में झील की तलछट में सुरक्षित जैविक अवशेषों का विश्लेषण किया गया, जिससे लगभग 8300 वर्ष पहले इस क्षेत्र में मानव उपस्थिति के स्पष्ट संकेत मिले।वैज्ञानिकों का मानना है कि यह उत्तराखंड में मानव इतिहास से जुड़ी अब तक की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक है।


शिकार के साथ खेती भी करते थे प्राचीन मानव
अध्ययन से पता चला कि उस समय गढ़वाल हिमालय में रहने वाले लोग केवल शिकार पर निर्भर नहीं थे।शोध में धान जैसी फसलों की खेती के प्रमाण भी सामने आए हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि उस दौर में कृषि गतिविधियां शुरू हो चुकी थीं।यह खोज हिमालयी क्षेत्रों में प्रारंभिक कृषि सभ्यता को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।विशेषज्ञों का कहना है कि इससे मानव जीवन शैली के विकास पर नई जानकारी मिलेगी।

 

मिट्टी के बर्तन और तांबे के उपयोग के मिले संकेत
रिसर्च के दौरान लगभग 3300 वर्ष पुराने मिट्टी के बर्तन बनाने के प्रमाण भी मिले हैं।इसके अलावा 3000 से 4000 वर्ष पहले तांबे के खनन और धातु उपयोग के संकेत भी वैज्ञानिकों को प्राप्त हुए हैं।इन साक्ष्यों से पता चलता है कि समय के साथ यहां रहने वाले समुदाय तकनीकी रूप से अधिक विकसित होते गए।यह खोज हिमालयी क्षेत्र में प्राचीन धातुकर्म और शिल्पकला के अध्ययन के लिए भी अहम मानी जा रही है।


उत्तराखंड का मानव इतिहास 4000 साल और पीछे पहुंचा
अब तक उत्तराखंड में मानव सभ्यता के सबसे पुराने ठोस प्रमाण लगभग 4000 से 4500 वर्ष पुराने माने जाते थे।नई रिसर्च के बाद यह समय-सीमा बढ़कर लगभग 8300 वर्ष हो गई है।इससे प्रदेश के इतिहास, पुरातत्व और मानव विकास से जुड़े कई पुराने अनुमानों में बदलाव संभव माना जा रहा है।विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में इस क्षेत्र में और भी महत्वपूर्ण खोजें सामने आ सकती हैं।


अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ शोध
IIT रुड़की के डिपार्टमेंट ऑफ अर्थ साइंस के प्रोफेसर डॉ. प्रदीप श्रीवास्तव के नेतृत्व में किए गए इस शोध को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका Quaternary Science Reviews में प्रकाशित किया गया है।शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन हिमालयी क्षेत्रों में मानव बसावट, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के इतिहास को समझने में नई दिशा देगा।वैज्ञानिक अब टोली ताल क्षेत्र में आगे भी विस्तृत अनुसंधान की तैयारी कर रहे हैं ताकि प्राचीन मानव सभ्यता से जुड़े और प्रमाण जुटाए जा सकें।

 

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Is niti se desh ka bhala hoga ya nahi — debate honi chahiye.

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India ki progress dekh ke dil khush ho gaya!

Tanya Bajaj

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Is niti se desh ka bhala hoga ya nahi — debate honi chahiye.

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Hamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.

Taushif Shekh

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Is decision ka poore desh par seedha asar padega.

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Bharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.

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