अमेरिका के टैरिफ के बावजूद निर्यात कायम: ट्रंप टैरिफ से भारत पर दबाव

Sneha Menon
10 घंटे पहलेSarkar ko iske baare mein kuch karna chahiye!
Nisha Shah
10 घंटे पहलेPehli baar itni sach khabar padhi, shukriya!
Saanvi Pandey
10 घंटे पहलेSarkar ko iske baare mein kuch karna chahiye!
Arjun Singh
10 घंटे पहलेIs maamle mein sarkari paksh kya hai?
Ravi sinha
10 घंटे पहलेSarkar ko public ko jawab dena chahiye.
Reyansh Joshi
10 घंटे पहलेYeh rajneeti ka asli chehra hai.
Anjali Patil
15 घंटे पहलेPehli baar itni sach khabar padhi, shukriya!
Shruti Bajpai
15 घंटे पहलेSarkar ko iske baare mein kuch karna chahiye!
Kabir Shukla
15 घंटे पहलेChunav ke baad sab bhool jaate hain, yahi haqeeqat hai.
Navya Nair
17 घंटे पहलेBahut achhi reporting ki hai, keep it up!
Anika Rajput
17 घंटे पहलेYeh rajneeti ka asli chehra hai.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से लगाए गए भारी टैरिफ के बावजूद अमेरिका को भारत के निर्यात में बड़ी गिरावट नहीं आई है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका अब भी भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार बना हुआ है। भारत के कुल वैश्विक निर्यात में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत बनी हुई है। पिछले एक साल के दौरान अमेरिकी टैरिफ कई बार बदले और एक समय इनकी प्रभावी दर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। इसके बावजूद भारतीय उत्पादों की अमेरिकी बाजार में मांग बनी रहने की बात सामने आई है। सरकार अब निर्यातकों को राहत देने के साथ नए बाजारों में पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।
टैरिफ को लेकर भारत अमेरिका में तनाव
जुलाई 2025 में अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। इसके साथ रूस से भारत द्वारा तेल और अन्य सामान खरीदने को लेकर अतिरिक्त पेनल्टी टैरिफ की चेतावनी भी दी गई थी। इससे भारत से अमेरिका जाने वाले कई उत्पादों पर शुल्क बढ़ने का खतरा पैदा हो गया था। भारत ने भी अपने घरेलू उद्योग और किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए जवाबी शुल्क की तैयारी की थी। दोनों देशों के बीच बातचीत के बाद फरवरी 2026 में टैरिफ व्यवस्था में बदलाव किया गया। हालांकि इसके बाद भी व्यापार से जुड़े कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
क्वार्ट्ज उत्पादों पर नया व्यापार विवाद
अमेरिका ने भारतीय क्वार्ट्ज सरफेस उत्पादों पर कोटा आधारित नया सुरक्षात्मक टैरिफ लागू किया है। नई व्यवस्था के तहत तय कोटे के भीतर आने वाले उत्पादों पर 25 प्रतिशत शुल्क लगाया गया है। कोटा समाप्त होने के बाद शुल्क की दर बढ़कर 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह व्यवस्था 15 अगस्त 2026 से अगले चार वर्षों के लिए लागू की गई है। इस फैसले से भारत के क्वार्ट्ज उत्पाद निर्यातकों के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। भारत ने अमेरिकी फैसले को लेकर विश्व व्यापार संगठन के जरिए औपचारिक कार्रवाई शुरू कर दी है।
भारत ने WTO में अमेरिका को चुनौती दी
अमेरिकी क्वार्ट्ज टैरिफ के खिलाफ भारत ने विश्व व्यापार संगठन में अमेरिका से परामर्श की मांग की है। भारत का यह कदम व्यापारिक विवाद को अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत सुलझाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। सरकार का कहना है कि भारतीय निर्यातकों और घरेलू उद्योगों के हितों की रक्षा करना उसकी प्राथमिकता है। भारत संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिकी उत्पादों को लेकर अपनी व्यापारिक सीमाओं को बनाए रखना चाहता है। कृषि और MSME जैसे क्षेत्रों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए सरकार ने अपनी रेड लाइन्स तय की हैं। WTO की प्रक्रिया के जरिए भारत अब अमेरिकी शुल्क के खिलाफ अपना पक्ष मजबूती से रखने की तैयारी कर रहा है।
अमेरिका पर निर्भरता घटाने की रणनीति
अमेरिकी टैरिफ को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत ने अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने की रणनीति तेज कर दी है। सरकार ब्रिटेन सहित कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को आगे बढ़ा रही है। ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौता जुलाई 2026 से लागू होने के बाद भारतीय निर्यातकों के लिए नए अवसर खुले हैं। यूरोपीय संघ, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भी व्यापारिक बातचीत को आगे बढ़ाया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य किसी एक बड़े बाजार पर भारतीय निर्यातकों की अत्यधिक निर्भरता को कम करना है। विशेषज्ञों के मुताबिक नए बाजारों में मजबूत पकड़ बनाने में उद्योगों को समय लग सकता है।
ट्रंप की नीति के बीच भारत का प्लान बी
अमेरिका की बदलती टैरिफ नीति के बीच भारत सरकार ने निर्यातकों के लिए वैकल्पिक बाजार तैयार करने पर जोर दिया है। सरकार घरेलू उद्योगों को मजबूत करने के साथ निर्यात बढ़ाने के लिए विभिन्न सहायता योजनाओं का इस्तेमाल कर रही है। भारतीय निर्यातक भी यूरोप और एशिया सहित नए बाजारों में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग बरकरार रहना कारोबार के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। हालांकि लंबे समय तक ऊंचे टैरिफ रहने पर कुछ क्षेत्रों के निर्यातकों पर लागत का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में भारत की रणनीति अमेरिका के साथ व्यापार जारी रखने के साथ-साथ नए वैश्विक बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की है।








