SIR Row Over Voter Lists: SIR पर 13 करोड़ नामों को लेकर सियासी घमासान

Ritika Ghosh
5 घंटे पहलेPehli baar itni sach khabar padhi, shukriya!
Dhruv Bhatt
6 घंटे पहलेYeh news bahut zaroori hai public ke liye.
Reyansh Joshi
7 घंटे पहलेIs maamle mein sarkari paksh kya hai?
Kavya Mishra
8 घंटे पहलेYeh rajneeti ka asli chehra hai.
Priya Iyer
9 घंटे पहलेSarkar ko iske baare mein kuch karna chahiye!
Anika Rajput
9 घंटे पहलेNishpaksh patrakarita ke liye shukriya, aise media chahiye.
Ritika Ghosh
10 घंटे पहलेIs maamle mein sarkari paksh kya hai?
Nidhi kumari
12 घंटे पहलेChunav ke baad sab bhool jaate hain, yahi haqeeqat hai.
SIR को लेकर विपक्ष के सवाल जारी
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। स्रोत के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने SIR की प्रक्रिया को वैध ठहराते हुए चुनाव आयोग के अधिकार और प्रक्रिया पर विस्तृत विचार किया था। इसके बावजूद विपक्ष मतदाता सूचियों से जुड़े नामों को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है और बड़ी संख्या में मतदाताओं को सूची से बाहर किए जाने का मुद्दा उठा रहा है।
13 करोड़ नामों का आंकड़ा चर्चा में क्यों
SIR के दौरान करीब 13.3 करोड़ ऐसे नामों का आंकड़ा सामने आया, जिन्हें लेकर अलग-अलग कारणों से सत्यापन या पुनरीक्षण की जरूरत बताई गई। स्रोत के अनुसार इनमें करीब 2.8 करोड़ ऐसे लोग शामिल थे जिनकी पिछले दो दशकों में मृत्यु हो चुकी थी। इसके अलावा एक करोड़ से अधिक नाम डुप्लीकेट बताए गए, जबकि करीब 6.5 करोड़ लोग स्थायी रूप से दूसरे स्थानों पर जा चुके थे।
करीब तीन करोड़ लोगों की स्थिति पर सवाल
चुनाव आयोग के अनुसार करीब तीन करोड़ लोग SIR के दौरान अपने दर्ज पते पर मौजूद नहीं थे। इसके अलावा ऐसे लोगों को भी नोटिस दिए गए जिन्हें विभिन्न कारणों से आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने में कठिनाई हुई। स्रोत के मुताबिक, इसी वर्ग को लेकर आगे की जांच और प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस अधिक केंद्रित है, जबकि बाकी नामों के संबंध में स्थिति काफी हद तक स्पष्ट बताई गई है।
20 राज्यों में दोबारा जांच की तैयारी
स्रोत के अनुसार चुनाव आयोग ने 20 राज्यों में उन मतदाताओं की दोबारा जांच की बात कही है जिन्हें नोटिस दिया गया था या अंतिम सूची में बाहर किया गया है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य पात्र मतदाताओं की स्थिति स्पष्ट करना और मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना बताया गया है। ऐसे मामलों में संबंधित मतदाताओं को अपनी पात्रता और दस्तावेजों से जुड़े पक्ष स्पष्ट करने का अवसर मिल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने SIR पर क्या कहा
मई 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने SIR से जुड़े कई संवैधानिक और कानूनी सवालों पर विचार किया था। अदालत ने माना कि चुनाव आयोग को SIR कराने का अधिकार है और प्रक्रिया को निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक दायित्व से जोड़ा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में नाम शामिल करने या बनाए रखने के संदर्भ में नागरिकता की सीमित जांच की जा सकती है।
आधार को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता और पहचान के बीच अंतर पर भी जोर दिया। स्रोत के अनुसार अदालत ने स्पष्ट किया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है। मतदाता सूची में शामिल होने के लिए नागरिकता से जुड़ी पात्रता महत्वपूर्ण है और चुनाव आयोग को कानून के तहत इसकी सीमित जांच करने का अधिकार है।
बिहार से शुरू हुआ था मामला
SIR का मामला 24 जून 2025 को बिहार में चुनाव आयोग की अधिसूचना के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। विभिन्न याचिकाओं में प्रक्रिया को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने लंबी सुनवाई के दौरान प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई, हालांकि पारदर्शिता और मतदाताओं के लिए प्रक्रिया को सरल बनाने से जुड़े कुछ निर्देश दिए। बाद में पश्चिम बंगाल में SIR से संबंधित मामला भी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
SIR की वैधानिकता और आगे की सुनवाई
स्रोत के अनुसार 27 मई के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह देखा कि क्या चुनाव आयोग के पास SIR कराने की शक्ति है, क्या इसका उद्देश्य वैध है और क्या अपनाई गई प्रक्रिया उस उद्देश्य के अनुपात में है। अदालत ने यह भी विचार किया कि प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व कानून और मतदाता पंजीकरण नियमों के अनुरूप है या नहीं। SIR से जुड़ी कुछ याचिकाओं पर आगे सुनवाई जारी रह सकती है, लेकिन स्रोत के मुताबिक मौजूदा सुनवाई प्रक्रिया की प्रणालीगत व्यवस्थाओं से संबंधित है।








