लाहौर में लौटे पुराने नाम: पाकिस्तान में फिर गूंजे कृष्णनगर, धर्मपुरा और जैन मंदिर चौक

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पाकिस्तान के लाहौर शहर में एक बार फिर इतिहास और विरासत को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। पंजाब प्रांत की मुख्यमंत्री मरियम नवाज के नेतृत्व में कई इलाकों, सड़कों और चौकों के पुराने नाम दोबारा बहाल किए जा रहे हैं। खास बात यह है कि इनमें कई नाम हिंदू और ब्रिटिश दौर से जुड़े रहे हैं, जिन्हें पहले इस्लामी या स्थानीय नामों से बदल दिया गया था।
अब लाहौर का इस्लामपुरा फिर से कृष्णनगर कहलाएगा, जबकि बाबरी चौक को दोबारा जैन मंदिर चौक नाम दिया गया है। वहीं मुस्तफाबाद का नाम बदलकर धर्मपुरा कर दिया गया है। इस फैसले ने पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया में चर्चा छेड़ दी है।
मरियम नवाज सरकार का बड़ा फैसला
बताया जा रहा है कि इसी साल मार्च में हुई एक अहम बैठक में पंजाब सरकार ने ऐतिहासिक पहचान से जुड़े पुराने नामों को वापस लाने का निर्णय लिया था। इस बैठक की अध्यक्षता खुद पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज ने की थी। सरकार का कहना है कि लाहौर की असली पहचान उसके इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है। इसलिए पुराने नामों को बहाल करना शहर की ऐतिहासिक पहचान को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
कौन-कौन से नाम बदले गए?
लाहौर में जिन प्रमुख इलाकों और चौकों के नाम बदले गए हैं, उनमें शामिल हैं:
इस्लामपुरा → कृष्णनगर
बाबरी चौक → जैन मंदिर चौक
मुस्तफाबाद → धर्मपुरा
इसके अलावा भी कई ऐतिहासिक स्थानों के पुराने नामों को वापस लाने की प्रक्रिया जारी बताई जा रही है।
क्यों उठाया गया यह कदम?
पाकिस्तान सरकार की ओर से तर्क दिया गया है कि इतिहास को मिटाकर आने वाली पीढ़ियों को सही पहचान नहीं दी जा सकती। शहरों की संस्कृति, विरासत और पहचान उनके ऐतिहासिक नामों से जुड़ी होती है। मरियम नवाज का कहना है कि चाहे इतिहास अच्छा हो या बुरा, उसे संभालकर रखना जरूरी है। नाम बदल देने से इतिहास नहीं बदलता, बल्कि लोग अपनी जड़ों से दूर हो जाते हैं।
सोशल मीडिया पर तेज हुई बहस
इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे पाकिस्तान में बदलती सोच और सांस्कृतिक सहिष्णुता का संकेत बता रहे हैं, तो कुछ इसे सिर्फ “हेरिटेज रिवाइवल” यानी ऐतिहासिक पहचान बचाने की कोशिश मान रहे हैं। कई यूजर्स का कहना है कि अगर इतिहास को बचाकर रखा जाए, तो आने वाली पीढ़ियां अपने अतीत को बेहतर तरीके से समझ सकती हैं।
क्या पाकिस्तान बदल रही है अपनी छवि?
पाकिस्तान लंबे समय से इस्लामी कट्टरता और पहचान की राजनीति को लेकर चर्चा में रहा है। ऐसे में हिंदू और ब्रिटिश दौर के नामों को दोबारा बहाल करने का फैसला कई लोगों को चौंकाने वाला लग रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश भी हो सकता है।
इतिहास मिटाने से नहीं बदलता सच
लाहौर में पुराने नामों की वापसी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नाम बदल देने से इतिहास बदल जाता है? इतिहासकारों का मानना है कि किसी भी समाज की पहचान उसके अतीत से बनती है और उसे संरक्षित रखना बेहद जरूरी होता है।





