बाल विवाह पर सभी धर्मों के लिए एक समान कानून: शरिया नहीं, केंद्रीय कानून होंगे प्रभावी: हाईकोर्ट

शरिया नहीं, केंद्रीय कानून होंगे प्रभावी: हाईकोर्ट
प्रतिक्रियाएँ
Neel Saxena

Neel Saxena

20 घंटे पहले

Desh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.

Nidhi kumari

Nidhi kumari

1 दिन पहले

Har Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.

Rohan Desai

Rohan Desai

1 दिन पहले

Desh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.

Myra Dubey

Myra Dubey

1 दिन पहले

Bharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.

Ishaan Tiwari

Ishaan Tiwari

1 दिन पहले

Is decision ka poore desh par seedha asar padega.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) और POCSO अधिनियम, 2012 जैसे केंद्रीय कानून देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्तिगत कानून (Personal Law) के आधार पर इन केंद्रीय कानूनों को दरकिनार नहीं किया जा सकता।


सभी धर्मों के लिए समान विवाह आयु लागू
न्यायालय ने कहा कि भारत में विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष है तथा यह नियम सभी धर्मों के नागरिकों पर समान रूप से लागू होगा। अदालत ने कहा कि बाल विवाह निषेध अधिनियम सार्वजनिक नीति और बच्चों की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया गया कानून है, इसलिए इसका पालन सभी के लिए अनिवार्य है।


यौवन के आधार पर विवाह का तर्क खारिज
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार यौवन प्राप्त करने के बाद लड़की विवाह के योग्य मानी जाती है। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि 18 वर्ष से कम आयु की लड़की के विवाह की अनुमति देना POCSO अधिनियम की भावना के विपरीत होगा, क्योंकि नाबालिग के साथ यौन संबंध कानून के तहत दंडनीय अपराध है।

 

बुलंदशहर की घटना से जुड़ा है मामला
यह मामला उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले का है, जहां एक 16 वर्षीय मुस्लिम नाबालिग का बाल विवाह रोके जाने के दौरान पुलिस और चाइल्डलाइन की टीम पर कथित हमला किया गया था। इस घटना में सरकारी कार्य में बाधा और हमला करने के आरोप में 19 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज हुई थी। आरोपियों ने FIR रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था।


 FIR रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि पुलिस और चाइल्डलाइन की टीम बाल विवाह रोकने और कानून का पालन कराने के अपने वैधानिक कर्तव्य का निर्वहन कर रही थी। इसलिए उनके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।


 बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि: अदालत
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि PCMA और POCSO अधिनियम सार्वजनिक स्वास्थ्य, बाल संरक्षण और राष्ट्रीय नीति पर आधारित कानून हैं, जिनका उद्देश्य बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा करना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत कानूनों की कोई भी व्याख्या इन केंद्रीय कानूनों से ऊपर नहीं हो सकती और बाल विवाह रोकना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

 

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Neel Saxena

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20 घंटे पहले

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Nidhi kumari

Nidhi kumari

1 दिन पहले

Har Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.

Rohan Desai

Rohan Desai

1 दिन पहले

Desh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.

Myra Dubey

Myra Dubey

1 दिन पहले

Bharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.

Ishaan Tiwari

Ishaan Tiwari

1 दिन पहले

Is decision ka poore desh par seedha asar padega.

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