ईरान-इजरायल तनाव 2026: बारदाने की कमी से रुकी गेहूं खरीदी

बारदाने की कमी से रुकी गेहूं खरीदी

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मिडिल ईस्ट में जारी ईरान-इजरायल तनाव (2026) का सीधा असर अब भारत के मध्य प्रदेश के किसानों पर दिखाई दे रहा है। पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई बाधित होने से प्लास्टिक बारदाने (PP और HDPP बैग) की भारी कमी हो गई है, जिसके चलते प्रदेश में गेहूं की सरकारी खरीदी तीसरी बार टालनी पड़ी है।
सरकार ने पहले खरीदी की तारीख 16 मार्च तय की थी, जिसे बाद में 1 अप्रैल और अब 10 अप्रैल तक बढ़ा दिया गया है। इस देरी ने लाखों किसानों की चिंता बढ़ा दी है।

खेतों से खलिहानों तक: फसल तैयार, खरीदी बंद
भोपाल और सीहोर जिले के गांवों में हालात बेहद चिंताजनक हैं। गेहूं कटकर तैयार है, लेकिन बारदाने की कमी के कारण खरीदी केंद्र बंद पड़े हैं।
घरों और खलिहानों में गेहूं के ढेर लगे हैं, किसान दिन-रात फसल की निगरानी कर रहे हैं, बारिश और चोरी का डर बना हुआ है, सीहोर के किसान अवध नारायण बताते हैं कि उन्होंने 20 एकड़ में गेहूं बोया था और तय तारीख के अनुसार कटाई करवा ली थी, लेकिन अब खरीदी में देरी से आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।

किसानों की परेशानी: “तारीख पर तारीख, लेकिन खरीदी नहीं”
एक अन्य किसान नरेश परमार के मुताबिक: 15 एकड़ की फसल घर में जमा है, गेहूं के ढेर छत तक पहुंच गए हैं, खरीदी शुरू होते ही लंबी कतारों का डर, किसानों के लिए यह सिर्फ फसल नहीं, बल्कि उनकी पूरी सालभर की आय और अगली फसल की तैयारी का आधार है।

बारदाने का संकट: असली वजह क्या है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार:
कुल आवश्यकता: लगभग 15.60 करोड़ बैग,
उपलब्धता: करीब 5.50 करोड़ बैग,
बारदाने (PP/HDPP बैग) पेट्रोलियम उत्पादों से बनते हैं। मिडिल ईस्ट में युद्ध के कारण: कच्चे माल की सप्लाई बाधित हुई, उत्पादन लागत बढ़ी, बैग निर्माण प्रभावित हुआ, वेयरहाउस संचालकों के अनुसार, बिना पर्याप्त बैग के खरीदी शुरू करना संभव नहीं है।

केले के किसानों पर भी असर
मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में केले की खेती करने वाले किसान भी इस संकट से प्रभावित हैं। खाड़ी देशों में निर्यात लगभग ठप, बाजार में कीमतें गिर गईं, फसल खराब होने का खतरा, निर्यात बंद होने से किसानों को मजबूरी में कम दाम पर फसल बेचनी पड़ रही है।

महंगाई का दोहरा वार
ईरान-इजरायल तनाव का असर सिर्फ बारदाने तक सीमित नहीं है। डीजल-पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी, कृषि कार्यों की लागत बढ़ी, माल ढुलाई महंगी हुई, इससे किसानों की कुल लागत बढ़ गई है और मुनाफा घट रहा है।

विपक्ष का हमला, सरकार पर सवाल
विपक्ष का आरोप है कि: सरकार को पहले से तैयारी करनी चाहिए थी, वैकल्पिक व्यवस्था (जूट बैग) समय पर नहीं की गई, 19 लाख से अधिक किसानों के पंजीयन के बावजूद व्यवस्थाएं अधूरी हैं, कांग्रेस नेता कुणाल चौधरी ने इसे सिर्फ युद्ध का असर नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही भी बताया।

समाधान की मांग: जूट बैग बने विकल्प
किसानों की मुख्य मांग है: जल्द से जल्द जूट के बारदाने उपलब्ध कराए जाएं, खरीदी प्रक्रिया तुरंत शुरू हो, फसल खराब होने से बचाई जाए, सरकार ने टेंडर जारी करने और जल्द आपूर्ति का आश्वासन दिया है, लेकिन जमीनी स्तर पर राहत अभी दूर नजर आ रही है।

वैश्विक संकट, स्थानीय संघर्ष
ईरान-इजरायल युद्ध का असर अब साफ तौर पर दिखा रहा है कि वैश्विक घटनाएं किस तरह गांवों के खलिहानों तक पहुंच रही हैं। मध्य प्रदेश के किसानों के लिए यह संकट सिर्फ देरी का नहीं, बल्कि अस्तित्व और आर्थिक स्थिरता का सवाल बन चुका है।

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