Reserved Seats Debate: SC-ST आरक्षित सीटों के रोटेशन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

SC-ST आरक्षित सीटों के रोटेशन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
प्रतिक्रियाएँ
Ravi sinha

Ravi sinha

0 सेकंड पहले

India ki progress dekh ke dil khush ho gaya!

Comments • Reactions • Feedback

 

SC-ST आरक्षित सीटों के रोटेशन पर बहस
भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए कुछ सीटें आरक्षित होती हैं। इन सीटों पर केवल संबंधित आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं, जबकि मतदान का अधिकार सभी मतदाताओं को होता है। यानी आरक्षित सीट पर रहने वाला मुस्लिम, हिंदू या किसी अन्य समुदाय का व्यक्ति वोट डाल सकता है, लेकिन सामान्य तौर पर मुस्लिम उम्मीदवार वहां से चुनाव नहीं लड़ सकता।

अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि SC-ST आरक्षित सीटों को हर कुछ साल में बदलने यानी रोटेशन का नियम बनाना अदालत का काम नहीं है। यह फैसला संसद को लेना है। इस व्यवस्था का एक पहलू मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी जुड़ा है।

 

सुप्रीम कोर्ट में क्या मामला पहुंचा था
यह मामला उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़ा है। याचिकाकर्ता जगदीश सिंह इस सीट के मतदाता हैं। उनका कहना था कि कादीपुर सीट 1952 के पहले विधानसभा चुनाव से ही अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रही है। करीब 75 साल से सीट आरक्षित रहने के कारण सामान्य वर्ग के उम्मीदवार यहां से चुनाव नहीं लड़ सकते।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि लंबे समय तक एक ही सीट आरक्षित रहने से लोकतांत्रिक विकल्प सीमित होते हैं। उनके वकील ने दावा किया कि पिछले कई दशकों में तीन-चार परिवारों को ही इसका फायदा मिलता रहा है और इससे पूरे दलित समुदाय का विकास नहीं हो रहा।

याचिका में मांग की गई थी कि पंचायत और नगर निकाय चुनावों की तरह विधानसभा और लोकसभा की आरक्षित सीटों पर भी रोटेशन लागू किया जाए। यानी कुछ चुनावों के बाद आरक्षित सीटों की जगह बदली जाए। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने माना था कि रोटेशन बेहतर व्यवस्था हो सकती है, लेकिन इसे लागू करने का आदेश अदालत नहीं दे सकती। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

 

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
4 नवंबर को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने याचिका खारिज कर दी। जस्टिस बागची ने कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाताओं से उम्मीद की जाती है कि वे जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक दल और उसकी विचारधारा के आधार पर वोट देंगे। यह मान लेना सही नहीं है कि किसी इलाके का बहुसंख्यक समुदाय हमेशा अपनी जाति या समुदाय के आधार पर ही मतदान करेगा।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आरक्षित सीट होने से किसी व्यक्ति का वोट देने का अधिकार नहीं छिनता। वह किसी भी उम्मीदवार को वोट दे सकता है। सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के पास दूसरी गैर-आरक्षित सीटों से चुनाव लड़ने का विकल्प भी है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह अपनी मांग संसद के सामने रखें। कोर्ट ने कहा कि वह संविधान या कानून में ऐसा प्रावधान नहीं जोड़ सकती, जो उसमें पहले से मौजूद नहीं है। अदालत के मुताबिक, आरक्षित सीटों का रोटेशन लागू करना विधायी नीति का मामला है। याचिकाकर्ता अपने जनप्रतिनिधियों के सामने यह मांग रख सकते हैं।

 

आरक्षित सीटें तय करने का फॉर्मूला
संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में लोकसभा और विधानसभा में SC-ST के लिए सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। इन सीटों की संख्या संबंधित राज्य या क्षेत्र में SC-ST आबादी के अनुपात के आधार पर तय होती है।

इसके अलावा परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) और 9(1)(d) आरक्षित सीटों के स्थान तय करने का आधार बताती हैं।

 

SC सीटें
ऐसे क्षेत्रों में रखी जाती हैं, जहां कुल आबादी में अनुसूचित जाति के लोगों का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक हो।

 

ST सीटें
ऐसे क्षेत्रों में रखी जाती हैं, जहां अनुसूचित जनजाति की आबादी का अनुपात सबसे अधिक हो।

यानी किसी क्षेत्र में दलित आबादी जितनी अधिक होगी, उसके आरक्षित सीट बनने की संभावना भी उतनी अधिक हो सकती है। कानून में हर चुनाव के बाद इन सीटों को बदलना अनिवार्य नहीं है।

याचिकाकर्ता ने पंचायतों और नगर निकायों में लागू अनुच्छेद 243D और 243T का हवाला दिया था। इन प्रावधानों के तहत स्थानीय निकायों में आरक्षण और सीटों के रोटेशन की व्यवस्था है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्थानीय निकायों और संसद-विधानसभा के चुनावों का संवैधानिक ढांचा अलग है। इसलिए एक व्यवस्था को दूसरी पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।

 

 

मौजूदा व्यवस्था से मुस्लिम उम्मीदवारों के अवसरों पर असर
इस सवाल को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि मुस्लिम समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं मिलता। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 के मुताबिक हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाला व्यक्ति SC का सदस्य नहीं माना जाता। इस व्यवस्था के कारण मुस्लिम उम्मीदवार SC के लिए आरक्षित सीटों से चुनाव नहीं लड़ सकते।

अब मान लीजिए कि किसी विधानसभा क्षेत्र में दलित आबादी के साथ मुस्लिम आबादी भी काफी अधिक है। परिसीमन के दौरान अगर उस क्षेत्र को SC के लिए आरक्षित कर दिया जाता है, तो वहां रहने वाले मुस्लिम मतदाता वोट तो डाल सकेंगे, लेकिन मुस्लिम उम्मीदवार उस सीट से चुनाव नहीं लड़ पाएंगे।

उदाहरण के तौर पर बिहार की गोपालगंज, उत्तर प्रदेश की बहराइच, नगीना और बुलंदशहर, गुजरात की कच्छ और अहमदाबाद पश्चिम तथा पश्चिम बंगाल की जयनगर और बर्दवान पूर्व सीटों का उल्लेख किया गया है। इन सीटों पर मुस्लिम आबादी अधिक बताई गई है, लेकिन ये अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं।

इसी वजह से लंबे समय तक एक ही सीट आरक्षित रहने से मुस्लिम उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने के अवसर सीमित हो सकते हैं। अगर सीटों का रोटेशन होता है, तो कुछ चुनावों के बाद ऐसी सीटें सामान्य हो सकती हैं और मुस्लिम उम्मीदवारों समेत दूसरे सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों को भी वहां से चुनाव लड़ने का मौका मिल सकता है। हालांकि, यह स्थिति हर मुस्लिम मतदाता या हर मुस्लिम बहुल इलाके पर लागू नहीं होती।

 

मुस्लिमों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व पहले से कम
मुस्लिमों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि उनकी आबादी और संसद में उनकी हिस्सेदारी के बीच अंतर दिखाई देता है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में मुस्लिम आबादी करीब 17.22 करोड़ थी, जो देश की कुल आबादी का 14.2 प्रतिशत थी। वहीं, अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस (CRS) की भारत पर रिपोर्ट के मुताबिक 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद संसद में मुस्लिम सांसदों की हिस्सेदारी करीब 4.4 प्रतिशत थी।

रिपोर्ट के मुताबिक 2024 के लोकसभा चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर सिर्फ 94 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। यह संख्या 2014 में 320 थी। इससे मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और उसकी आबादी के अनुपात के बीच अंतर सामने आता है।

ऐसे में अगर मुस्लिम आबादी वाले कुछ इलाके लंबे समय तक SC आरक्षित बने रहते हैं, तो वहां से मुस्लिम उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने के अवसर भी सीमित रह सकते हैं।

 

अब आगे क्या होगा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आरक्षित सीटों के रोटेशन का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। कोर्ट ने सिर्फ यह कहा है कि इस पर फैसला लेने का अधिकार संसद और विधायिका के पास है। यानी संसद चाहे तो कानून में बदलाव करके लोकसभा और विधानसभा की आरक्षित सीटों के रोटेशन की व्यवस्था कर सकती है। इसके लिए राजनीतिक सहमति और कानूनी बदलाव की जरूरत होगी।

इस मामले में दो अलग-अलग सवाल हैं। पहला, SC-ST समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षित सीटें जरूरी हैं या नहीं। दूसरा, क्या वही सीटें दशकों तक आरक्षित रहनी चाहिए या समय-समय पर उनका रोटेशन होना चाहिए? आरक्षण का उद्देश्य वंचित समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना है, लेकिन सीटों का चयन और लंबे समय तक उनका आरक्षित बने रहना दूसरे समुदायों के उम्मीदवारों के चुनावी अवसरों को भी प्रभावित कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बहस पर फैसला लेने से इनकार कर दिया है। अब यह संसद पर निर्भर है कि वह मौजूदा व्यवस्था जारी रखती है या रोटेशन के जरिए प्रतिनिधित्व का नया रास्ता खोलती है।

प्रतिक्रियाएँ
Ravi sinha

Ravi sinha

0 सेकंड पहले

India ki progress dekh ke dil khush ho gaya!

Comments • Reactions • Feedback

खबरे और भी है...