TMC में बगावत से ममता बनर्जी की बढ़ीं मुश्किलें: 58 विधायकों के दावे से बंगाल की राजनीति में भूचाल

Dhruv Bhatt
0 सेकंड पहलेSarkar ko iske baare mein kuch karna chahiye!
Tanya Bajaj
0 सेकंड पहलेPehli baar itni sach khabar padhi, shukriya!
Trapti Tanwar
1 घंटे पहलेIs khabar ko sahi tarike se cover kiya gaya hai.
Rohan Desai
2 घंटे पहलेNeta ji ko yeh khabar zaroor dikhni chahiye!
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा सियासी संकट खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) को अपने 28 वर्षों के इतिहास में पहली बार गंभीर आंतरिक विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के 58 विधायकों के बागी गुट के साथ आने और निष्कासित नेता रीतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता घोषित किए जाने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ पर सवाल उठने लगे हैं। इस घटनाक्रम ने बंगाल की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।
58 विधायकों के समर्थन का दावा, स्पीकर को सौंपा पत्र
बागी गुट के नेता रीतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष को 58 विधायकों के समर्थन पत्र सौंपने का दावा किया है। यदि यह संख्या सही साबित होती है तो यह दलबदल विरोधी कानून के तहत आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से अधिक होगी। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी गुट के दावे को स्वीकार किए जाने की खबरों ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। रीतब्रत बनर्जी ने कहा कि विधानसभा में अब वही "असली तृणमूल कांग्रेस" का प्रतिनिधित्व करते हैं क्योंकि उनके साथ बहुमत विधायक मौजूद हैं।
ममता बनर्जी को स्वीकार, अभिषेक बनर्जी पर उठे सवाल
दिलचस्प बात यह है कि बागी विधायकों ने ममता बनर्जी को अब भी पार्टी अध्यक्ष के रूप में स्वीकार करने की बात कही है। हालांकि उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के हस्तक्षेप और प्रभाव को लेकर नाराजगी जताई है। विद्रोही खेमे का कहना है कि विधायक दल के कामकाज में अभिषेक बनर्जी की भूमिका को लेकर लंबे समय से असंतोष था, जो अब खुलकर सामने आ गया है।
क्या कहता है दलबदल विरोधी कानून?
इस पूरे विवाद के केंद्र में भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून है। इसके तहत यदि कोई विधायक पार्टी छोड़ता है या पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करता है तो उसकी सदस्यता जा सकती है।
हालांकि यदि किसी गुट के साथ मूल पार्टी के दो-तिहाई विधायक शामिल हो जाते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से राहत मिल सकती है। महाराष्ट्र में शिवसेना विभाजन के दौरान एकनाथ शिंदे गुट को इसी आधार पर कानूनी राहत मिली थी।
महाराष्ट्र मॉडल की चर्चा क्यों?
राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में हुई टूट से कर रहे हैं। वहां भी विधायक दल के भीतर बहुमत के आधार पर नेतृत्व परिवर्तन और पार्टी नियंत्रण की लड़ाई देखने को मिली थी।
अब बंगाल में भी वही स्थिति बनती दिखाई दे रही है, जहां संगठन और विधायक दल के बीच शक्ति संतुलन का संघर्ष खुलकर सामने आ गया है।
TMC नेतृत्व ने उठाया बड़ा कदम
संकट की गंभीरता को देखते हुए तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व ने राज्यभर की पार्टी समितियों और विभिन्न मोर्चों को भंग कर दिया है। पार्टी का कहना है कि संगठनात्मक ढांचे की व्यापक समीक्षा के बाद नए सिरे से पुनर्गठन किया जाएगा। राजनीतिक जानकार इसे पार्टी पर नियंत्रण बनाए रखने और बढ़ते असंतोष को रोकने की रणनीति मान रहे हैं।
आगे क्या होगा?
अब सबकी निगाहें बागी गुट के वास्तविक संख्या बल पर टिकी हैं। यदि 58 विधायकों का दावा साबित होता है तो यह ममता बनर्जी के लिए बड़ा राजनीतिक झटका साबित हो सकता है। वहीं यदि संख्या कम निकलती है तो बागी विधायकों पर अयोग्यता की कार्रवाई का खतरा मंडरा सकता है।
फिलहाल बंगाल की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां यह लड़ाई केवल विधायकों की संख्या की नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस की पहचान, नेतृत्व और भविष्य की दिशा तय करने वाली बन गई है।



