बेटियों ने अंतिम संस्कार से किया इनकार: वृद्धाश्रम और समाजसेवियों ने निभाया बेटे का फर्ज
Aarav Sharma
0 सेकंड पहलेDesh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.
Sai Mehta
0 सेकंड पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Aditya Verma
0 सेकंड पहलेDesh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.
Kabir Shukla
0 सेकंड पहलेHamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.
Myra Dubey
0 सेकंड पहलेBharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.
Ayaan Khan
0 सेकंड पहलेIs niti se desh ka bhala hoga ya nahi — debate honi chahiye.
Diya Gupta
0 सेकंड पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Arjun Singh
0 सेकंड पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Sneha Menon
0 सेकंड पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Aarohi Chaudhary
0 सेकंड पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Trapti Tanwar
0 सेकंड पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Dev Kapoor
0 सेकंड पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Monika Das
0 सेकंड पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Simran Arora
0 सेकंड पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Diya Gupta
0 सेकंड पहलेBharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.
Priya Iyer
0 सेकंड पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Vivaan Gupta
0 सेकंड पहलेIndia ki progress dekh ke dil khush ho gaya!
Ada khan
0 सेकंड पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Taushif Shekh
0 सेकंड पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Vihaan Patel
0 सेकंड पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Arjun Singh
0 सेकंड पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Sneha Menon
0 सेकंड पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Simran Arora
0 सेकंड पहलेJai Hind! Desh pahle, baaki sab baad mein.
Pooja Reddy
0 सेकंड पहलेDesh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.
Kavya Mishra
0 सेकंड पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Kabir Shukla
0 सेकंड पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Neha Tripathi
0 सेकंड पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Rohan Desai
0 सेकंड पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम से सामने आई यह घटना रिश्तों, पारिवारिक जिम्मेदारी और सामाजिक संवेदनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। आश्रम में रह रहे 74 वर्षीय शिवचरण गुप्ता के निधन के बाद उनकी बेटियों ने दूरी और समय की कमी का हवाला देते हुए अंतिम संस्कार में शामिल होने से इनकार कर दिया। इस भावुक घटना ने वहां मौजूद सभी लोगों को झकझोर कर रख दिया और अंततः आश्रम प्रबंधन ने पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार कराया।
वीडियो कॉल से दी अंतिम विदाई
शिवचरण गुप्ता के निधन की सूचना मिलने के बाद उनकी बेटियों से संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने सोनीपत आने में असमर्थता जताई। उन्होंने Google Pay के माध्यम से ₹5100 भेजते हुए अनुरोध किया कि अंतिम संस्कार की पूरी प्रक्रिया वीडियो कॉल पर दिखाई जाए। परिवार की इस प्रतिक्रिया ने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया। अंतिम संस्कार की सभी रस्में वीडियो कॉल के माध्यम से पूरी कराई गईं, जबकि परिजन दूर बैठे सब कुछ देखते रहे।
अस्थियां लेने से भी किया इनकार
घटना यहीं तक सीमित नहीं रही। अंतिम संस्कार के बाद जब आश्रम प्रबंधन ने बेटियों से अस्थियां लेने की बात कही तो उन्होंने आने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे अस्थि विसर्जन के लिए भी नहीं पहुंच पाएंगी। इसके बाद आश्रम के कर्मचारियों और स्थानीय समाजसेवियों ने परिवार की भूमिका निभाते हुए अस्थियों का विधि-विधान से विसर्जन कराने का निर्णय लिया। इस पहल की स्थानीय लोगों ने सराहना की।
आश्रम बना परिवार, पूरे सम्मान से निभाई जिम्मेदारी
आश्रम प्रबंधन और स्थानीय समाजसेवियों ने शिवचरण गुप्ता को पूरे धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ अंतिम विदाई दी। उन्होंने बेटे का फर्ज निभाते हुए मुखाग्नि से लेकर सभी आवश्यक संस्कार पूरे किए। समाजसेवियों का कहना था कि कोई भी बुजुर्ग अकेला महसूस न करे और अंतिम समय में उसे सम्मान मिलना सबसे बड़ी मानवता है। इस संवेदनशील पहल ने मानवता की मिसाल पेश की।
समाज के सामने खड़े हुए कई गंभीर सवाल
यह घटना आधुनिक जीवनशैली, पारिवारिक रिश्तों और बुजुर्गों की स्थिति पर गंभीर चिंतन का विषय बन गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक सहायता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण अपने माता-पिता के प्रति भावनात्मक और नैतिक जिम्मेदारी होती है। सोशल मीडिया पर भी इस घटना को लेकर लोगों ने मिश्रित प्रतिक्रियाएं दीं। कई लोगों ने इसे बदलते सामाजिक मूल्यों का दुखद उदाहरण बताया, जबकि कुछ ने परिस्थितियों को समझने की बात कही। यह मामला बुजुर्गों के सम्मान, पारिवारिक दायित्व और मानवीय संवेदनाओं पर एक गहरी बहस छेड़ रहा है।
मानवता की मिसाल बन गया वृद्धाश्रम
जहां एक ओर परिजन अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके, वहीं वृद्धाश्रम और स्थानीय समाजसेवियों ने यह साबित कर दिया कि रिश्ते केवल खून से नहीं बल्कि संवेदनाओं और जिम्मेदारियों से भी बनते हैं। शिवचरण गुप्ता को सम्मानजनक विदाई देकर उन्होंने समाज के सामने मानवता, करुणा और सेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। यह घटना हर परिवार को अपने बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारी और सम्मान का संदेश देती है।
बुजुर्गों के सम्मान पर नई बहस
सोनीपत की यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि तेजी से बदलते सामाजिक ढांचे का आईना भी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते शहरीकरण, व्यस्त जीवनशैली और परिवारों के विखंडन के बीच बुजुर्गों की देखभाल सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती बनती जा रही है। ऐसे समय में समाज, परिवार और संस्थाओं को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी बुजुर्ग को अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में अकेलापन और उपेक्षा का सामना न करना पड़े।






