Award And Resistance: मुकेश भारद्वाज के लेख में पुरस्कारों पर उठे सवाल

Vihaan Patel
1 दिन पहलेYeh khabar sabko share karni chahiye!
Diya Gupta
1 दिन पहलेItni important news, dosto ko zaroor bhejo.
Dev Kapoor
1 दिन पहलेBreaking news! Sabko is baare mein pata hona chahiye.
Trapti Tanwar
1 दिन पहलेIska aage kya hoga? Koi update milega kya?
Reyansh Joshi
1 दिन पहलेIs update ka bahut intezaar tha.
Riya Jain
1 दिन पहलेIs update ka bahut intezaar tha.
Pihu Agarwal
1 दिन पहलेYeh khabar tezi se viral ho rahi hai, share karo!
हथियार का हार’ में पुरस्कारों पर सवाल
मुकेश भारद्वाज के कॉलम ‘बेबाक बोल’ में प्रकाशित लेख ‘हथियार का हार’ साहित्यिक पुरस्कारों, पुरस्कार वापसी और सत्ता के साथ साहित्य के संबंधों पर सवाल उठाता है। लेख में लेखक ने 2015 की पुरस्कार वापसी की बहस को मौजूदा साहित्यिक परिदृश्य से जोड़ते हुए अपने विचार रखे हैं।
पुरस्कार वापसी की पुरानी बहस
लेख में सितंबर 2015 के दादरी कांड और एमएम कलबुर्गी की हत्या के बाद शुरू हुई पुरस्कार वापसी की मुहिम का उल्लेख किया गया है। लेखक के अनुसार, उस समय कई साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों ने पुरस्कारों को सार्वजनिक नैतिक प्रतिरोध के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया था।
अखलाक और कलबुर्गी का संदर्भ
मुकेश भारद्वाज ने लेख में मोहम्मद अखलाक और एमएम कलबुर्गी की याद को साहित्य और सार्वजनिक प्रतिरोध की बहस से जोड़ा है। लेख का तर्क है कि पुरस्कारों को लेकर बदले रुख को उसी दौर में स्थापित नैतिक और सार्वजनिक रुख के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।
पुरस्कार और सत्ता का संबंध
लेख में साहित्यिक पुरस्कारों के स्रोत, सत्ता से उनके संबंध और पुरस्कार स्वीकार करने के फैसलों पर सवाल उठाए गए हैं। लेखक ने ज्यां पाल सार्त्र और नोबेल पुरस्कार समेत कई उदाहरणों का उल्लेख करते हुए पुरस्कार स्वीकार करने या ठुकराने की बहस को सामने रखा है।
अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का जिक्र
कॉलम में जेफरी एपस्टीन, बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप जैसे अंतरराष्ट्रीय संदर्भों का भी इस्तेमाल किया गया है। लेखक ने इन उदाहरणों के जरिए पुरस्कारों, प्रभावशाली व्यक्तियों और सार्वजनिक नैतिकता के बीच संबंधों पर अपनी आलोचनात्मक राय व्यक्त की है।
लेख का मुख्य सवाल
लेख के अंत में पुरस्कार को कभी प्रतिरोध के माध्यम और कभी सम्मान के रूप में स्वीकार किए जाने के बीच मौजूद विरोधाभास पर सवाल उठाया गया है। मुकेश भारद्वाज ने अखलाक और कलबुर्गी की याद को इस बहस के केंद्र में रखते हुए साहित्यिक पुरस्कारों की भूमिका पर विचार करने की अपील की है।







