“9 हजार कमाई, 12 हजार गुजारा भत्ता!”: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
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भारत में तलाक और गुजारा भत्ता से जुड़े मामलों में अदालतें अक्सर महत्वपूर्ण टिप्पणियां करती हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसा ही मामला सामने आया, जिसमें पति की मासिक आय और पत्नी द्वारा मांगे गए मेंटेनेंस को लेकर तीखी बहस देखने को मिली।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पति की कम आय के दावे पर संदेह जताते हुए सख्त टिप्पणी की और कहा कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति की जिम्मेदारी है। जरूरत पड़े तो उधार लेकर भी इस जिम्मेदारी को निभाना होगा।

क्या है पूरा मामला
यह मामला एक पति-पत्नी के तलाक और गुजारा भत्ता से जुड़ा है। पति ने अदालत में दावा किया कि वह दिहाड़ी मजदूर है और उसकी रोज की मजदूरी मात्र 325 रुपये है। उसने कोर्ट को बताया कि कड़ी मेहनत करने के बावजूद उसकी मासिक आय मुश्किल से 9,000 रुपये तक पहुंचती है। ऐसे में वह अपनी पत्नी को हर महीने 12,000 रुपये गुजारा भत्ता नहीं दे सकता। पति ने अदालत से गुहार लगाते हुए कहा कि इतनी कम कमाई में उससे ज्यादा मेंटेनेंस देना संभव नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने जताया संदेह
इस मामले की सुनवाई Supreme Court of India की बेंच कर रही थी, जिसमें Justice Vikram Nath और Justice Sandeep Mehta शामिल थे। बेंच ने पति के दावे पर भरोसा करने से इनकार करते हुए कहा कि आज के समय में इतनी कम आय होना असंभव लगता है। अदालत ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी कौन सी कंपनी है जो कर्मचारियों को न्यूनतम दैनिक मजदूरी से भी कम भुगतान करती है।

कंपनी को तलब करने की बात
पति ने बताया कि वह हिंदुस्तान ऑटो एजेंसी नाम की फर्म में काम करता है। इस पर अदालत ने कहा कि यदि ऐसा है तो कंपनी को भी तलब किया जा सकता है ताकि यह पता चल सके कि वहां कर्मचारियों को कितनी सैलरी दी जाती है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इतनी कम सैलरी का दावा भरोसेमंद नहीं लगता।

“मेंटेनेंस नहीं दे सकते तो पत्नी को साथ रखें”
सुनवाई के दौरान अदालत ने एक और सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि यदि पति गुजारा भत्ता नहीं दे सकता तो उसे अपनी पत्नी को अपने साथ रखना चाहिए, ताकि वह खाना बनाकर अपना, बच्चों का और पति का गुजारा कर सके।

“उधार लेकर भी निभानी होगी जिम्मेदारी”
पति के वकील George Pothan ने कहा कि उनका मुवक्किल सच बोल रहा है और वह अपनी आय का हलफनामा देने को भी तैयार है। हालांकि अदालत ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति की जिम्मेदारी है।
कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा: पत्नी के गुजारे के लिए पैसे का इंतजाम करना पति की जिम्मेदारी है। जरूरत पड़े तो उधार लेकर भी यह जिम्मेदारी निभानी होगी।

पत्नी ने रखे दो विकल्प
इस मामले में पहले निचली अदालत ने पति को पत्नी को 6 लाख रुपये देकर तलाक देने का आदेश दिया था। लेकिन पत्नी इस रकम से संतुष्ट नहीं हुई और उसने पहले हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
पत्नी ने कोर्ट के सामने दो विकल्प रखे:
पति जीवनभर हर महीने 12,000 रुपये गुजारा भत्ता दे, जिसमें हर साल बढ़ोतरी हो।
या फिर 30 लाख रुपये एकमुश्त भुगतान करे।

अदालत ने फैसला रखा सुरक्षित
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब सभी की नजरें इस बात पर हैं कि अदालत इस संवेदनशील मामले में क्या अंतिम फैसला देती है।

भारत में बढ़ते तलाक के मामले
भारत में पिछले कुछ वर्षों में तलाक के मामलों में तेजी से वृद्धि देखी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, आर्थिक विवाद, पारिवारिक मतभेद और बदलती सामाजिक परिस्थितियां इसके प्रमुख कारण बन रहे हैं। गुजारा भत्ता और एलिमनी से जुड़े मामलों में अदालतें अक्सर संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं ताकि दोनों पक्षों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।

यह मामला सिर्फ एक पति-पत्नी के विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि गुजारा भत्ता तय करते समय आय, जिम्मेदारी और सामाजिक परिस्थितियों को कैसे संतुलित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने के बाद यह मामला भविष्य के कई मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

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