UP Police Under Court Scrutiny: यूपी पुलिस की जांच पर कोर्ट के लगातार सवाल

Rohan Desai
0 सेकंड पहलेGawahon ki suraksha bhi utni hi zaroori hai.
Neha Tripathi
0 सेकंड पहलेAise logon ko chhoda bilkul nahi jaana chahiye.
Ada khan
0 सेकंड पहलेKanoon ko apna kaam karna chahiye bina der ke.
Aarohi Chaudhary
29 मिनट पहलेAise logon ko chhoda bilkul nahi jaana chahiye.
Kunal Rao
1 घंटे पहलेGawahon ki suraksha bhi utni hi zaroori hai.
Kabir Shukla
2 घंटे पहलेAise logon ko chhoda bilkul nahi jaana chahiye.
Sneha Menon
2 घंटे पहलेGawahon ki suraksha bhi utni hi zaroori hai.
Kabir Shukla
4 घंटे पहलेPeedit ko jald se jald nyay milna chahiye.
FIR से जांच तक पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल
उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली से जुड़े कई मामलों में हाल के महीनों में सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जांच, FIR, गिरफ्तारी और हिरासत की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इन मामलों में अदालतों ने अलग-अलग परिस्थितियों में रिकॉर्ड की विसंगतियों, आरोपी की गिरफ्तारी के तरीके और कानूनी प्रक्रिया के पालन की जांच की है। 30 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बुलंदशहर से जुड़े एक मामले में इस बात पर सवाल उठाया कि मौके पर पकड़े जाने का दावा किए गए व्यक्ति का नाम FIR में शुरू में दर्ज क्यों नहीं किया गया। कोर्ट ने पुलिस की जांच की विश्वसनीयता पर चिंता जताई और मामले की जांच CBI को सौंपने की संभावना का भी उल्लेख किया।
खुर्जा मामले में FIR पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी
बुलंदशहर के खुर्जा से जुड़े मामले में शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया था कि घटना के दौरान एक व्यक्ति को पकड़कर पुलिस के हवाले किया गया, लेकिन FIR में उसे अज्ञात बताया गया और बाद में उसका नाम जांच में जोड़ा गया। सुप्रीम कोर्ट ने FIR में इस अंतर और जांच के रिकॉर्ड को लेकर पुलिस से स्पष्टीकरण मांगा। अदालत की चिंता यह थी कि यदि पुलिस को आरोपी की पहचान के बारे में जानकारी थी तो FIR में उसे अज्ञात दिखाने का आधार क्या था। इसी मामले में कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति जनता के पुलिस पर भरोसे को प्रभावित कर सकती है।
गिरफ्तारी और हिरासत में प्रक्रिया का मामला
इलाहाबाद हाई कोर्ट के 18 सितंबर 2026 के फैसले में कमलेश कुमार से जुड़े मामले में अदालत ने पाया कि उन्हें 15 अगस्त से पुलिस हिरासत में रखा गया और 19 अगस्त को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, पुलिस ने उन्हें 19 अगस्त को गिरफ्तार दिखाया था, जबकि जांच और CCTV से संबंधित सामग्री से 15 अगस्त से ही पुलिस हिरासत में होने की बात सामने आई। हाई कोर्ट ने इसे गैरकानूनी हिरासत माना और तत्काल रिहाई का आदेश दिया। संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जानकारी भी अदालत के सामने रखी गई।
NSA मामलों में भी अदालतों ने उठाए सवाल
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत हिरासत से जुड़े मामलों में भी अदालतों ने प्रक्रिया और उपलब्ध सामग्री की जांच की। 2 सितंबर 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द करते हुए ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने हिरासत के आधार को पर्याप्त सामग्री के बिना बनाया गया माना और मुआवजे की राशि संबंधित अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश के कुछ हिस्सों पर विचार किया, लेकिन आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द किए जाने वाला हिस्सा बरकरार रहा।
संभल मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
29 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा से जुड़े मल्ला अफरोज की NSA के तहत की गई निवारक हिरासत रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि निवारक हिरासत को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त और कानूनी रूप से टिकाऊ सामग्री जरूरी है। फैसले में अदालत ने हिरासत आदेश और उसकी पुष्टि को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत भी लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले में संबंधित आपराधिक मामलों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी गई है।
अदालतों की चिंता का केंद्र क्या है
इन अलग-अलग मामलों को एक साथ देखने पर अदालतों की मुख्य चिंता पुलिस की जांच में कानूनी प्रक्रिया, रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और हिरासत से जुड़े नियमों के पालन को लेकर दिखाई देती है। FIR में आरोपी की पहचान, पुलिस हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच अंतर, NSA के तहत हिरासत के पर्याप्त आधार और जांच के दौरान उपलब्ध सामग्री जैसे मुद्दे अदालतों के सामने आए हैं। हालांकि इन मामलों के आधार पर उत्तर प्रदेश पुलिस की हर जांच या हर अधिकारी की कार्यप्रणाली पर सामान्य निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। प्रत्येक मामले में अदालत के आदेश और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ही स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए।
कोर्ट की टिप्पणियों के बाद जवाबदेही पर जोर
हालिया न्यायिक आदेशों से यह स्पष्ट है कि पुलिस की जांच और हिरासत की कार्रवाई न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहती है। जहां अदालतों को प्रक्रिया में गंभीर कमी मिली, वहां रिहाई, मुआवजा या राज्य पर लागत जैसे आदेश दिए गए। वहीं, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के इन मामलों में अंतिम निष्कर्ष संबंधित केस के रिकॉर्ड और परिस्थितियों पर आधारित हैं। इसलिए अदालत की टिप्पणियों को पूरे पुलिस बल के बारे में सामान्य आरोप के रूप में नहीं, बल्कि संबंधित मामलों में सामने आई न्यायिक आपत्तियों के रूप में देखना अधिक उचित है।








