SC Upholds Grandson Appointment: दादा-दादी की मौत पर पोते को मिल सकती है नौकरी

Sneha Menon
0 सेकंड पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Neha Tripathi
0 सेकंड पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
Yash Kulkarni
0 सेकंड पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Anika Rajput
41 मिनट पहलेBharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.
Ada khan
2 घंटे पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
दादा-दादी की मौत पर पोते को मिल सकती है अनुकंपा नियुक्ति
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जिसमें रेलवे को मृत कर्मचारी के पोते जितेंद्र वर्मा की अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर राहत देने का निर्देश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और रेलवे की चुनौती वाली याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। हालांकि यह फैसला हर मामले में पोते को स्वतः नियुक्ति का अधिकार नहीं देता, बल्कि संबंधित सेवा नियमों और परिस्थितियों के तहत निकट संबंधी के रूप में दावे पर विचार किए जाने से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर को दिया फैसला
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने 28 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि उसे हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई उचित आधार नजर नहीं आता। इसके साथ ही रेलवे की वह चुनौती समाप्त हो गई, जिसके जरिए पोते को अनुकंपा नियुक्ति देने के आदेश को चुनौती दी गई थी।
दादी की मृत्यु के बाद जितेंद्र ने किया था दावा
मामले के अनुसार जितेंद्र वर्मा के दादा की वर्ष 2002 में मृत्यु हो गई थी और उनके पिता का भी वर्ष 2006 में निधन हो गया था। जितेंद्र का पालन-पोषण उनकी दादी छमा बाई ने किया, जो पश्चिम मध्य रेलवे के भोपाल मंडल में हेल्पर-2/खलासी के पद पर कार्यरत थीं। 19 जून 2016 को नौकरी के दौरान छमा बाई की मृत्यु हो गई। इसके बाद जितेंद्र ने उनकी जगह अनुकंपा नियुक्ति दिए जाने का दावा किया।
सर्विस रिकॉर्ड में नाम और उत्तराधिकार प्रमाणपत्र का भी जिक्र
जितेंद्र का नाम वर्ष 2007 में छमा बाई के सर्विस रिकॉर्ड में उत्तराधिकारी और नामिनी के रूप में दर्ज किया गया था। इसके अलावा उन्होंने 30 जनवरी 2018 को सिविल कोर्ट से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र भी प्राप्त किया था। रेलवे ने इस प्रमाणपत्र को नौकरी देने के बजाय सेवानिवृत्ति से जुड़े बकाया के भुगतान तक सीमित माना। जितेंद्र ने खुद को छमा बाई का गोद लिया हुआ बेटा भी बताया था, लेकिन रेलवे ने उनके गोद लिए जाने की वैधता पर सवाल उठाते हुए नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया।
हाई कोर्ट ने माना था निकट संबंधी
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने रेलवे की अनुकंपा नियुक्ति नीति के क्लॉज-3 का उल्लेख करते हुए कहा था कि पात्रता केवल पुत्र, पुत्री, विधवा या विधुर तक सीमित नहीं है। निर्धारित शर्तों के तहत निकट संबंधी और वैध रूप से गोद लिए गए पुत्र-पुत्री भी इसके दायरे में आ सकते हैं। हाई कोर्ट ने कहा था कि जितेंद्र को दत्तक पुत्र नहीं मानने की स्थिति में भी वह मृत कर्मचारी का पोता होने के कारण निकट संबंधी की श्रेणी में आता है।
रेलवे को 30 दिन में नियुक्ति पर विचार का निर्देश
हाई कोर्ट ने रेलवे द्वारा जितेंद्र के दावे को बार-बार खारिज किए जाने पर भी आपत्ति जताई थी और कहा था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य परिवार को समय पर राहत देना है। अदालत ने रेलवे को 30 दिन के भीतर अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया था और 10 हजार रुपये मुकदमा खर्च के रूप में देने को भी कहा था। रेलवे ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।








