Delhi SIR Voter List Hearing: दिल्ली SIR पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

Ravi sinha
0 सेकंड पहलेHamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.
Neha Tripathi
0 सेकंड पहलेDesh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.
Pranav Srivastava
0 सेकंड पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Trapti Tanwar
0 सेकंड पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Sneha Menon
0 सेकंड पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Pranav Srivastava
1 घंटे पहलेBharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.
Aarohi Chaudhary
2 घंटे पहलेHamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.
Monika Das
2 घंटे पहलेIs niti se desh ka bhala hoga ya nahi — debate honi chahiye.
दिल्ली में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया के दौरान 33.13 लाख से अधिक मतदाताओं को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ या ‘नो मैपिंग’ जैसी श्रेणियों के आधार पर नोटिस दिए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। 22 सितंबर 2026 को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से इन नोटिसों के आधार और ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ तय करने के तरीके को स्पष्ट करने को कहा। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि इतनी बड़ी संख्या में नोटिस किस प्रक्रिया और संसाधनों के आधार पर जारी किए गए।
‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ और ‘नो मैपिंग’ क्या है
SIR के दौरान मतदाताओं की मौजूदा जानकारी को पुराने चुनावी रिकॉर्ड से मिलाया जा रहा है। जिन मतदाताओं के रिकॉर्ड का पिछली गहन पुनरीक्षण सूची से मिलान नहीं हो पाया या जिनकी जानकारी में निर्धारित मानकों के अनुसार विसंगति पाई गई, उन्हें नोटिस प्रक्रिया में शामिल किया गया। दिल्ली CEO कार्यालय के अनुसार करीब 33.13 लाख मतदाताओं को ऐसी श्रेणियों में चिन्हित किया गया और 31.63 लाख से अधिक नोटिस जारी किए जा चुके थे। इसका उद्देश्य संबंधित मतदाता से जानकारी और दस्तावेज लेकर रिकॉर्ड का सत्यापन करना बताया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मांगा स्पष्टीकरण
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से नोटिस जारी करने के मानदंड और कारणों को लेकर सवाल उठाए गए। उनका कहना है कि लाखों मतदाताओं को नोटिस दिए जाने के बावजूद यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसी व्यक्ति को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ या ‘नो मैपिंग’ में रखने का सटीक आधार क्या है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी इस वर्गीकरण की प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण मांगा और चुनाव आयोग से जवाब देने को कहा। अदालत ने प्रक्रिया को समझाने के लिए FAQ जैसे उपाय का सुझाव भी दिया।
चुनाव आयोग ने कहा नोटिस का मतलब नाम कटना नहीं
दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि SIR के तहत नोटिस जारी होने का मतलब मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाना नहीं है। नोटिस को डेटा सत्यापन और रिकॉर्ड में सुधार की प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है। CEO कार्यालय के अनुसार किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे अपनी बात रखने का अवसर दिया जाएगा और उचित कारणों वाला आदेश पारित किया जाएगा। आयोग की व्यवस्था में नोटिस प्राप्त करने वाले मतदाताओं के लिए दस्तावेज जमा कर अपनी जानकारी सत्यापित कराने की प्रक्रिया भी उपलब्ध है।
ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 47 लाख से ज्यादा नामों का मुद्दा
SIR के ड्राफ्ट चरण में दिल्ली की मतदाता सूची में बड़ी संख्या में नाम शामिल नहीं किए गए या अलग-अलग कारणों से चिन्हित किए गए हैं। रिपोर्टों में यह संख्या 47 लाख से अधिक बताई गई है। हालांकि इसे सीधे तौर पर अंतिम रूप से मतदाता सूची से नाम काटे जाने के रूप में पेश करना सही नहीं होगा, क्योंकि SIR में दावे, आपत्तियां, सत्यापन और सुनवाई की प्रक्रिया जारी है। दिल्ली CEO की आधिकारिक SIR व्यवस्था में नोटिस चरण और दावों-आपत्तियों के निपटारे के लिए अलग प्रक्रिया निर्धारित है, जिसके बाद अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जानी है।
सत्यापन के बाद ही अंतिम स्थिति होगी साफ
SIR प्रक्रिया में नोटिस पाने वाले मतदाताओं को अपनी जानकारी और जरूरी दस्तावेजों के जरिए रिकॉर्ड का सत्यापन कराने का अवसर दिया जा रहा है। चुनाव आयोग के आधिकारिक पोर्टल पर SIR से जुड़े दस्तावेज जमा करने और अंतिम मतदाता सूची में अपना नाम जांचने की सुविधा भी उपलब्ध है। ऐसे में फिलहाल किसी नोटिस को अंतिम नाम कटने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की 22 सितंबर की सुनवाई का प्रमुख मुद्दा नोटिस जारी करने के आधार और प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा है, जबकि अंतिम मतदाता सूची में किसका नाम रहेगा, यह सत्यापन और निर्धारित चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद स्पष्ट होगा।








