सुप्रीम कोर्ट में DMK को झटका, याचिका वापस: विजय के भाषण पर रोक लगाने से कोर्ट का इनकार

Ritika Ghosh
22 घंटे पहलेYeh khabar bahut important hai, sabko pata honi chahiye!
Sonu rai
1 दिन पहलेSarkar ko iske baare mein kuch karna chahiye!
Arjun Singh
1 दिन पहलेYeh news bahut zaroori hai public ke liye.
Trapti Tanwar
1 दिन पहलेSarkar ko iske baare mein kuch karna chahiye!
सुप्रीम कोर्ट ने अभिनेता से राजनेता बने सी. जोसेफ विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) के नेताओं के सार्वजनिक भाषणों पर रोक लगाने की मांग वाली DMK की याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने सुनवाई के दौरान याचिका पर कई कड़े सवाल उठाए, जिसके बाद DMK ने अपनी याचिका वापस ले ली।
करूर भगदड़ मामले से जुड़ा है विवाद
यह मामला सितंबर 2025 में तमिलनाडु के करूर में हुई दुखद भगदड़ की घटना से जुड़ा है, जिसमें कई लोगों की जान गई थी। DMK का आरोप था कि विजय और उनकी पार्टी के नेताओं के सार्वजनिक बयान इस मामले की जांच और कानून-व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए उन पर अस्थायी रोक लगाई जाए।
कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दिया जोर
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के बोलने के अधिकार (Freedom of Speech) पर पहले से न्यायिक रोक लगाना उचित नहीं होगा। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसा आदेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के विपरीत हो सकता है और बिना ठोस कानूनी आधार के ऐसा प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।
FIR में विजय का नाम नहीं होने पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस मामले का हवाला दिया जा रहा है, उसकी FIR में विजय का नाम तक शामिल नहीं है। अदालत ने सवाल किया कि जब संबंधित व्यक्ति आरोपी ही नहीं है, तो उसके भाषणों पर प्रतिबंध लगाने की मांग किस आधार पर की जा रही है।
अदालत ने राजनीतिक मंच बनाने पर जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि न्यायालय का इस्तेमाल राजनीतिक विवादों के मंच के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि अदालतें केवल कानूनी विवादों का समाधान करती हैं, राजनीतिक मतभेदों का नहीं।
कड़े रुख के बाद DMK ने वापस ली याचिका
सुप्रीम कोर्ट के रुख को देखते हुए DMK ने अपनी याचिका वापस लेने का निर्णय लिया। इसके साथ ही विजय और उनकी पार्टी के नेताओं के सार्वजनिक भाषणों पर प्रतिबंध लगाने की मांग समाप्त हो गई। इस मामले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।








