गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ मैरिज रजिस्ट्रेशन से नहीं होगा हिंदू विवाह वैध

Tanya Bajaj
17 घंटे पहलेYeh haalat bahut chintajanak hai, jaldi karyawahi ho.
Nisha Shah
21 घंटे पहलेHum is cause ke saath hain!
Tanya Bajaj
22 घंटे पहलेYeh sirf ek ghar ki nahi, pure samaj ki baat hai.
Simran Arora
1 दिन पहलेYeh mamla sabke saath ho sakta hai, jaagrukata zaroori.
Aryan Malhotra
1 दिन पहलेHum is cause ke saath hain!
गुजरात हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह की वैधता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल विवाह का पंजीकरण (Marriage Registration) किसी हिंदू विवाह को वैध नहीं बनाता। अदालत ने कहा कि यदि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा-7 के तहत आवश्यक धार्मिक रीति-रिवाज, विशेष रूप से जहां प्रचलित हो वहां सप्तपदी (सात फेरे) जैसी रस्में संपन्न नहीं हुई हैं, तो केवल मैरिज सर्टिफिकेट के आधार पर विवाह को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
यूके में रहने वाले व्यक्ति की अपील पर आया फैसला
यह मामला यूनाइटेड किंगडम (UK) में रहने वाले एक भारतीय नागरिक की अपील से जुड़ा था। अपीलकर्ता ने अदालत को बताया कि अहमदाबाद की एक महिला ने कथित रूप से नौकरी दिलाने का झांसा देकर उससे कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करा लिए और बाद में उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर विवाह प्रमाणपत्र तैयार करा लिया। उसका दावा था कि दोनों के बीच कभी हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह नहीं हुआ और न ही वे कभी पति-पत्नी के रूप में साथ रहे।
महिला ने भी माना- कोई विवाह समारोह नहीं हुआ
सुनवाई के दौरान संबंधित महिला ने भी स्वीकार किया कि दोनों के बीच विवाह की कोई धार्मिक रस्म या समारोह आयोजित नहीं हुआ था और वे कभी वैवाहिक जीवन नहीं जीए। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने केवल विवाह प्रमाणपत्र के आधार पर विवाह को तत्काल अमान्य घोषित करने से इनकार कर दिया था।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश किया रद्द
जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वच्छानी की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि जब आवश्यक धार्मिक संस्कार ही संपन्न नहीं हुए, तब केवल रजिस्ट्रेशन किसी विवाह को वैध नहीं बना सकता। अदालत ने संबंधित विवाह को शून्य (Void) घोषित कर दिया।
धारा-7 और धारा-8 के बीच बताया स्पष्ट अंतर
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-7 विवाह संपन्न होने की आवश्यक धार्मिक प्रक्रिया निर्धारित करती है। यदि संबंधित समुदाय में सप्तपदी की परंपरा है, तो सातवां फेरा पूरा होने के बाद ही विवाह पूर्ण माना जाता है।
वहीं धारा-8 केवल पहले से विधिवत संपन्न विवाह के पंजीकरण (Registration) की व्यवस्था करती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह पंजीकरण केवल रिकॉर्ड रखने का माध्यम है, यह किसी अधूरे या अवैध विवाह को वैध नहीं बना सकता।
अदालत ने विवाह को बताया पवित्र संस्कार
खंडपीठ ने कहा कि हिंदू विवाह केवल कानूनी अनुबंध नहीं बल्कि एक धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार है। विवाह दो व्यक्तियों के साथ-साथ दो परिवारों के स्थायी संबंध की स्थापना करता है। इसलिए विवाह की पवित्रता, उससे जुड़ी जिम्मेदारियों और कानून द्वारा निर्धारित आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किया जाना अनिवार्य है।
क्या इस फैसले से कोर्ट मैरिज प्रभावित होगी?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इस फैसले का स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत होने वाली कोर्ट मैरिज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह निर्णय केवल उन विवाहों पर लागू होता है जो हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के अंतर्गत हिंदू धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न किए जाते हैं। स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह की प्रक्रिया अलग है और उसमें धार्मिक रस्में अनिवार्य नहीं होतीं।
आम लोगों के लिए फैसले का महत्व
इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि हिंदू विवाह की वैधता केवल मैरिज सर्टिफिकेट पर निर्भर नहीं करती। यदि भविष्य में किसी विवाह की वैधता पर विवाद उत्पन्न होता है, तो आवश्यक धार्मिक रस्मों के संपन्न होने का महत्व भी कानूनी रूप से जांच का विषय रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला फर्जी विवाह प्रमाणपत्रों से जुड़े विवादों में महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बन सकता है।








