Article 358 Explained: CJP प्रदर्शन मामले में सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 358 का जिक्र

Vaishali shinde
0 सेकंड पहलेJai Hind! Desh pahle, baaki sab baad mein.
Payal jadon
1 घंटे पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Pranav Srivastava
1 घंटे पहलेDesh ke liye yeh ek mahatvapurna khabar hai.
Vihaan Patel
3 घंटे पहलेIs niti se desh ka bhala hoga ya nahi — debate honi chahiye.
Pihu Agarwal
3 घंटे पहलेIndia ki progress dekh ke dil khush ho gaya!
Harsh Pandya
5 घंटे पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Monika Das
6 घंटे पहलेIs decision ka poore desh par seedha asar padega.
CJP प्रदर्शन मामले में अनुच्छेद 358 का जिक्र
दिल्ली में CJP प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई, मेट्रो सेवाओं और इंटरनेट पर पाबंदियों से जुड़े मामले की सुप्रीम कोर्ट में विशेष सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 358 का उल्लेख किया गया। सुनवाई में अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़े सवाल उठाए और पूछा कि क्या मौजूदा परिस्थितियों को अघोषित आपातकाल की तरह देखा जा सकता है। उन्होंने अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली स्वतंत्रताओं और आपातकालीन प्रावधानों के संबंध पर अदालत का ध्यान आकर्षित किया। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आरोपों का विरोध किया और जवाब देने के लिए समय मांगा।
क्या है संविधान का अनुच्छेद 358?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 358 राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 के अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव से संबंधित है। यह प्रावधान हर प्रकार के आपातकाल में लागू नहीं होता। संविधान के अनुसार, युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर घोषित राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 358 प्रभावी हो सकता है। ऐसी स्थिति में अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली स्वतंत्रताओं से संबंधित संवैधानिक व्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार सामान्य परिस्थितियों में केवल अनुच्छेद 358 का हवाला देकर नागरिकों की स्वतंत्रता समाप्त कर सकती है।
अनुच्छेद 19 नागरिकों को कौन-कौन से अधिकार देता है?
संविधान का अनुच्छेद 19 भारतीय नागरिकों को कई महत्वपूर्ण स्वतंत्रताएं प्रदान करता है। इनमें बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्वक और बिना हथियार इकट्ठा होने का अधिकार, संगठन या संघ बनाने की स्वतंत्रता, भारत में स्वतंत्र रूप से घूमने, किसी भी हिस्से में रहने और बसने तथा पेशा, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता शामिल हैं। हालांकि, इन अधिकारों पर संविधान में निर्धारित शर्तों के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसलिए अभिव्यक्ति और प्रदर्शन की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ संवैधानिक सीमाओं के अधीन भी है।
क्या अनुच्छेद 358 से सामान्य परिस्थितियों में छिन जाती है बोलने की आजादी?
नहीं। अनुच्छेद 358 अपने आप सामान्य परिस्थितियों में लागू नहीं हो जाता। इसका संबंध संविधान के तहत घोषित विशेष प्रकार के राष्ट्रीय आपातकाल से है। इसके लागू होने की संवैधानिक शर्तें पूरी होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 19 के अधिकारों पर लागू होने वाले प्रतिबंध और अनुच्छेद 358 का प्रभाव अलग-अलग संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार समझे जाते हैं। इसलिए किसी विरोध प्रदर्शन पर पुलिस की कार्रवाई या इंटरनेट सेवा में बाधा को अपने आप अनुच्छेद 358 के लागू होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों का आकलन संबंधित आदेशों, कानूनी आधार और परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में प्रदर्शन और नागरिक स्वतंत्रता पर बहस
सुनवाई के दौरान प्रदर्शनकारियों की ओर से हिरासत, निषेधाज्ञा, इंटरनेट सेवाओं और सार्वजनिक परिवहन से जुड़े मुद्दे उठाए गए। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने पुलिस की कार्रवाई और नागरिकों की आवाजाही पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर दलीलें दीं। वहीं, सरकार की ओर से इन आरोपों का विरोध किया गया और जवाब देने के लिए समय मांगा गया। अदालत के समक्ष प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन का सवाल भी महत्वपूर्ण रहा। किसी भी पक्ष के आरोपों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता, जब तक अदालत उन पर निर्णय न दे।
प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन
संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध और अपनी बात रखने का अधिकार देता है, जबकि प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी निभानी होती है। किसी प्रदर्शन पर प्रतिबंध, हिरासत या इंटरनेट सेवा रोकने जैसे कदमों की वैधता उनके कानूनी आधार और परिस्थितियों पर निर्भर करती है। CJP प्रदर्शन मामले में उठे सवाल इसी व्यापक बहस से जुड़े हैं कि नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करते हुए सार्वजनिक व्यवस्था कैसे बनाए रखी जाए। अनुच्छेद 358 का वास्तविक प्रभाव समझने के लिए राष्ट्रीय आपातकाल की संवैधानिक शर्तों और अनुच्छेद 19 के प्रावधानों को साथ में देखना जरूरी है।








