अमृतकाल बनाम विदेशी नागरिकता: “बाप देशी, बेटा विदेशी” ट्रेंड क्यों कर रहा है?

“बाप देशी, बेटा विदेशी” ट्रेंड क्यों कर रहा है?

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भारत में ‘अमृतकाल’ को देश के स्वर्णिम भविष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। सरकार आत्मनिर्भर भारत, वैश्विक नेतृत्व और तेज़ विकास के बड़े दावे कर रही है। लेकिन इसी बीच सोशल मीडिया और जनचर्चा में एक सवाल लगातार गूंज रहा है—जब देश अमृतकाल में प्रवेश कर चुका है, तो सत्ता के शीर्ष नेताओं के परिवार विदेश में क्यों बसे हैं?

शीर्ष नेताओं के परिजनों की विदेशी नागरिकता
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल के बेटे विवेक डोभाल ब्रिटिश नागरिक बताए जाते हैं।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के बेटे ध्रुव जयशंकर अमेरिकी नागरिक हैं।
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बेटे ध्रुव गोयल अमेरिका में रहते हैं।
इन तथ्यों के सामने आने के बाद यह मुद्दा तेजी से सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया है।

सोशल मीडिया पर उबाल, ट्रेंड कर रहे हैशटैग
मामले के सामने आते ही सोशल मीडिया पर #बाप_देशी_और_बेटा_विदेशी और #वाह_रे_देश_की_राजनीति जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।
लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अगर भारत अवसरों का केंद्र बन चुका है, तो देश चलाने वालों के अपने परिवार भारत में क्यों नहीं रह रहे?

व्यक्तिगत अधिकार बनाम नैतिक जिम्मेदारी
संवैधानिक रूप से नागरिकता और निवास का फैसला पूरी तरह व्यक्तिगत अधिकार है। किसी भी नेता के बेटे-बेटी अपने माता-पिता के पद से कानूनी रूप से बंधे नहीं होते।
लेकिन राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस भारत को आम जनता के लिए स्वर्णिम बताया जा रहा है, क्या वही भरोसा सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग अपने परिवार के लिए भी दिखाते हैं?

ब्रेन ड्रेन और अवसरों की असमानता पर बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला किसी एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्रेन ड्रेन और अवसरों की असमानता से जुड़ा है।
अगर भारत में उच्च शिक्षा, रिसर्च और वैश्विक स्तर की सुविधाएं पर्याप्त होतीं, तो शायद इस तरह के सवाल ही न उठते।

सवाल पूछना लोकतंत्र की ताकत
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि जनता सवाल पूछे। सवाल पूछना देश विरोध नहीं, बल्कि देश को बेहतर बनाने की प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।
अमृतकाल की असली परीक्षा तभी होगी, जब भारत सिर्फ भाषणों और दावों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी अपने नागरिकों की पहली पसंद बने।

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