CJI बोले छात्रों को विरोध का हक: NALSAR में CJI के निमंत्रण पर विरोध

Reyansh Joshi
0 सेकंड पहलेYeh mamla sabke saath ho sakta hai, jaagrukata zaroori.
Vaishali shinde
0 सेकंड पहलेAam aadmi ki taklif samjhna aur samajhana dono zaroori hai.
Ritika Ghosh
0 सेकंड पहलेYeh samajik mudda bahut gambhir hai, dhyan dena zaroori hai.
Reyansh Joshi
0 सेकंड पहलेYeh mudda rajneeti se upar hai, insaniyat ki baat hai.
Priya Iyer
0 सेकंड पहलेLogon ki madad karna hi asli dharam hai.
Vihaan Patel
0 सेकंड पहलेHum is cause ke saath hain, awaaz uthani chahiye.
Diya Gupta
0 सेकंड पहलेYeh mudda rajneeti se upar hai, insaniyat ki baat hai.
Arjun Singh
0 सेकंड पहलेYeh sirf ek ghar ki nahi, pure samaj ki baat hai.
हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 400 से अधिक छात्रों ने CJI सूर्यकांत को दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाए जाने पर आपत्ति जताई थी। छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से निमंत्रण पर पुनर्विचार करने की मांग की थी। विवाद की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की कुछ सुनवाइयों को लेकर छात्रों की नाराजगी बताई गई। खास तौर पर जुलाई में छात्र प्रदर्शन से जुड़े पुलिस कार्रवाई के वीडियो को अदालत में देखने से इनकार किए जाने का मुद्दा उठाया गया। इस विरोध के बाद मामला विश्वविद्यालय से निकलकर बार काउंसिल और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। हालांकि बाद में CJI ने स्पष्ट किया कि उन्होंने NALSAR का निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया था।
BCI ने NALSAR छात्रों के नामांकन पर रोक लगाई
विवाद बढ़ने के बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने NALSAR के 2026 बैच के कानून स्नातकों के नामांकन को लेकर सख्त निर्देश जारी किया। प्रारंभिक आदेश में राज्य बार काउंसिलों से छात्रों को अधिवक्ता के रूप में नामांकित नहीं करने को कहा गया था। इस फैसले के बाद कानूनी और छात्र समुदाय में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। आलोचकों ने इसे छात्रों के विरोध के अधिकार से जोड़कर सवाल उठाए। मामला सामने आने के कुछ ही घंटों बाद BCI ने अपना निर्देश वापस ले लिया। बाद में BCI अध्यक्ष की ओर से छात्रों के प्रति खेद भी जताया गया।
CJI ने छात्रों के विरोध के अधिकार का समर्थन किया
14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने NALSAR छात्रों के खिलाफ BCI की कार्रवाई पर कड़ा रुख अपनाया। अदालत में BCI के उस कदम पर सवाल उठे जिसमें छात्रों के नामांकन को रोकने की बात कही गई थी। CJI ने स्पष्ट किया कि छात्रों द्वारा शांतिपूर्ण तरीके से अपनी असहमति जताना अलग बात है। उनके रुख के बाद BCI को अपने आदेश पर पीछे हटना पड़ा। इस घटनाक्रम ने छात्रों के अभिव्यक्ति के अधिकार और कानूनी पेशे में प्रवेश के बीच संतुलन को लेकर बहस छेड़ दी। विवाद के बीच CJI ने छात्रों के साथ संवाद की भावना को भी सामने रखा।
NLSIU के छात्रों ने भी जताई आपत्ति
NALSAR के बाद बेंगलुरु स्थित NLSIU के छात्रों और पूर्व छात्रों ने भी इस विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी। 700 से अधिक छात्रों और पूर्व छात्रों के समर्थन से CJI सूर्यकांत और BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा को लेकर आपत्ति दर्ज की गई। छात्रों ने NALSAR मामले में BCI की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। उन्होंने संस्थान से इस पूरे घटनाक्रम को लेकर जवाबदेही और माफी की मांग की। इस विरोध से स्पष्ट हुआ कि विवाद केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रहा। देश के प्रमुख विधि संस्थानों में छात्र अधिकार और न्यायिक संस्थाओं के संबंधों को लेकर चर्चा तेज हो गई।
CJI ने कहा मैंने निमंत्रण स्वीकार नहीं किया
17 अगस्त को CJI सूर्यकांत ने NALSAR दीक्षांत समारोह से जुड़े विवाद पर अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उन्होंने विश्वविद्यालय का निमंत्रण कभी स्वीकार नहीं किया था। ऐसे में उनके दीक्षांत समारोह में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता। उनका यह बयान उस समय आया जब छात्रों के विरोध और BCI की कार्रवाई को लेकर विवाद काफी बढ़ चुका था। NALSAR ने परंपरा के अनुसार CJI को समारोह के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन उनकी ओर से निमंत्रण स्वीकार किए जाने की पुष्टि नहीं हुई थी। CJI के बयान के बाद विवाद का एक महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट हुआ।
विवाद ने छात्रों के अधिकार पर बहस छेड़ी
NALSAR विवाद ने कानून के छात्रों के विरोध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर देशभर में बहस शुरू कर दी है। एक तरफ छात्रों ने संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े अपने सवालों को शांतिपूर्ण तरीके से उठाने की बात कही। दूसरी तरफ BCI ने शुरुआत में छात्रों के विरोध को लेकर कड़ा रुख अपनाया था। हालांकि नामांकन रोकने का आदेश वापस लिए जाने के बाद मामला कुछ हद तक शांत हुआ। इसके बाद NLSIU के छात्रों ने भी NALSAR के छात्रों के समर्थन में अपनी आवाज उठाई। अब यह मामला छात्रों के अधिकार, बार नियमन और न्यायिक संस्थाओं के प्रति असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक सवालों के रूप में देखा जा रहा है।








