ग्लेशियर से तबाही का दावा: नेपाल बाढ़ पर चीन का पलटवार

Aarav Sharma
2 घंटे पहलेIndia ki progress dekh ke dil khush ho gaya!
Riya Jain
2 घंटे पहलेJai Hind! Desh pahle, baaki sab baad mein.
Vaishali shinde
2 घंटे पहलेHamara desh sahi direction mein ja raha hai, umeed hai.
Ishaan Tiwari
4 घंटे पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Anil Sen
6 घंटे पहलेIs niti se desh ka bhala hoga ya nahi — debate honi chahiye.
Shruti Bajpai
6 घंटे पहलेIndia ki progress dekh ke dil khush ho gaya!
Simran Arora
6 घंटे पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Ritika Ghosh
9 घंटे पहलेDesh ke navyuvak ko aage aana chahiye is mudde par.
Pihu Agarwal
10 घंटे पहलेIs niti se desh ka bhala hoga ya nahi — debate honi chahiye.
नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण फ्लैश फ्लड और जलप्रलय के बाद अब समय पर चेतावनी को लेकर चीन और नेपाल के बीच विवाद सामने आया है। चीन का दावा है कि उसने भारी बारिश और अचानक बाढ़ के खतरे को लेकर नेपाल को पहले ही चेतावनी भेज दी थी। चीनी पक्ष के मुताबिक वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल सेंटर के माध्यम से मौसम संबंधी पूर्वानुमान नेपाली अधिकारियों तक पहुंचाए गए थे। दूसरी ओर नेपाल की आपदा एजेंसियां सवाल उठा रही हैं कि उन्हें आपदा से ठीक पहले पर्याप्त रियल टाइम जानकारी क्यों नहीं मिली। इसी मुद्दे को लेकर दोनों देशों के दावों में अंतर सामने आया है।
चीन का दावा 12 दिन पहले भेजा था अलर्ट
चीनी दूतावास का कहना है कि वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल सेंटर ने 12 दिन पहले ही नेपाल के अधिकारियों को भारी मानसूनी बारिश और फ्लैश फ्लड की संभावना को लेकर ईमेल भेजा था। चीन के अनुसार यह चेतावनी 14 से 19 अगस्त के मौसम पूर्वानुमान से संबंधित थी और इसमें अत्यधिक बारिश के खतरे का उल्लेख किया गया था। चीनी अधिकारियों का यह भी कहना है कि करीब एक महीने पहले से ही WeChat और ईमेल के जरिए नेपाल के साथ मौसम संबंधी जानकारी साझा की जा रही थी। चीन ने इसी आधार पर समय पर चेतावनी नहीं देने के आरोपों को खारिज किया है।
नेपाल ने रियल टाइम डेटा पर उठाए सवाल
नेपाल के जलविज्ञान और मौसम विज्ञान विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सामान्य मौसम पूर्वानुमान और आपदा से ठीक पहले मिलने वाले रियल टाइम अलर्ट में बड़ा अंतर है। नेपाली पक्ष के मुताबिक उन्हें सीमा पार पानी के बहाव और अचानक आई बाढ़ की ऐसी लाइव जानकारी नहीं मिली, जिससे प्रभावित इलाकों को समय रहते खाली कराया जा सके। नेपाल का कहना है कि 26 अगस्त की सुबह अचानक आई बाढ़ ने निगरानी व्यवस्था को भी प्रभावित किया और पानी तेजी से त्रिशूली नदी की ओर पहुंच गया। इसी वजह से नेपाल में यह सवाल उठ रहा है कि यदि सीमा पार से तत्काल डेटा साझा किया जाता तो नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता था या नहीं।
ग्लेशियर और भूवैज्ञानिक घटना को लेकर दावा
नेपाल की ओर से इस आपदा के पीछे तिब्बत क्षेत्र में हुई भूवैज्ञानिक हलचल और ग्लेशियर टूटने की संभावना बताई गई है। अचानक बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नदी में आने से निचले इलाकों में तेज बाढ़ की स्थिति बनी। चीनी पक्ष का कहना है कि दुर्गम और अत्यधिक ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में अचानक होने वाली भूवैज्ञानिक घटनाओं के लिए मिनट-दर-मिनट सटीक चेतावनी देना तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल होता है। चीन ने इन परिस्थितियों को देखते हुए तत्काल राहत और बचाव कार्यों पर ध्यान देने की बात कही है। साथ ही चीन की ओर से नेपाल के लिए करीब 22 लाख डॉलर की फौरी वित्तीय सहायता की घोषणा की गई है।
चीन और नेपाल के दावों में बढ़ा अंतर
इस पूरे विवाद का मुख्य केंद्र यह है कि क्या पहले भेजा गया मौसम पूर्वानुमान उस अचानक आई आपदा के लिए पर्याप्त चेतावनी था या नहीं। चीन इसे समय पर साझा की गई मौसम संबंधी जानकारी बता रहा है, जबकि नेपाल इसे सामान्य पूर्वानुमान मानते हुए रियल टाइम डेटा की कमी की बात कह रहा है। नेपाल की आपदा एजेंसियों का मानना है कि सीमा पार अचानक पानी बढ़ने की स्थिति में तत्काल जानकारी मिलने से स्थानीय प्रशासन को लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का अधिक समय मिल सकता था। अब दोनों देशों के दावों के बीच उपलब्ध मौसम और जल प्रवाह संबंधी डेटा की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।
एक और बाढ़ के खतरे को लेकर चिंता
इस बीच सीमा क्षेत्र में भारी मलबे के कारण अस्थायी प्राकृतिक झील या बैरियर लेक बनने की आशंका ने चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्टों के अनुसार इसमें बड़ी मात्रा में पानी जमा होने की स्थिति में प्राकृतिक अवरोध टूटने पर नीचे की ओर अचानक बाढ़ आ सकती है। ऐसी स्थिति में त्रिशूली और भोटे कोशी नदी के आसपास के निचले इलाकों पर दोबारा खतरा पैदा हो सकता है। नेपाल के साथ-साथ भारत के सीमावर्ती नदी क्षेत्रों में भी सतर्कता जरूरी मानी जा रही है। हालांकि प्राकृतिक झील के टूटने और संभावित जलप्रलय से जुड़े दावों की स्थिति को आधिकारिक और वैज्ञानिक निगरानी के आधार पर ही अंतिम रूप से आंका जाना चाहिए।





