पुरी में जय जगन्नाथ के जयघोष से गूंजा बड़दंडा: नौ दिन बाद श्रीमंदिर पहुंचे भगवान जगन्नाथ
Pihu Agarwal
0 सेकंड पहलेYeh toh planets ki chaal ka hi asar hai!
Taushif Shekh
0 सेकंड पहलेAaj ka din bahut mahatvapurna raha jyotish ke hisaab se.
Navya Nair
0 सेकंड पहलेKundali dekhkar bohot kuch pehle pata chal jata hai.
Monika Das
0 सेकंड पहलेDharm aur aastha hi insaan ko sahi raah dikhati hai.
Anjali Patil
0 सेकंड पहलेGraha nakshatra sab kuch pehle se bata dete hain.
Pranav Srivastava
0 सेकंड पहलेSpirituality hi asli shakti hai is duniya mein.
Simran Arora
0 सेकंड पहलेRishiyon ne sadi pehle hi inka jikr kiya tha.
Krishna Yadav
0 सेकंड पहलेAaj ka din bahut mahatvapurna raha jyotish ke hisaab se.
Aditya Verma
0 सेकंड पहलेSpirituality hi asli shakti hai is duniya mein.
Pooja Reddy
0 सेकंड पहलेIshwar ki leela ko koi nahi samjha sakta.
Taushif Shekh
0 सेकंड पहलेIshwar ki leela ko koi nahi samjha sakta.
Ritika Ghosh
0 सेकंड पहलेGraha nakshatra sab kuch pehle se bata dete hain.
Vivaan Gupta
0 सेकंड पहलेBhagwan par bharosa rakhna chahiye, woh sab sahi karenge.
ओडिशा के पुरी में विश्व प्रसिद्ध बाहुड़ा यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा नौ दिनों तक गुंडिचा मंदिर में विश्राम करने के बाद अपने मुख्य धाम श्रीमंदिर लौट आए। इस दिव्य यात्रा में लाखों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर भगवान के दर्शन किए। पूरे बड़दंडा मार्ग पर 'जय जगन्नाथ' के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो गया। देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं ने इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनकर अपनी आस्था प्रकट की। यात्रा शांतिपूर्ण और भव्य वातावरण में संपन्न हुई।
पहांडी रीति से रथों पर विराजे तीनों देव
बाहुड़ा यात्रा की शुरुआत पारंपरिक पहांडी रीति से हुई, जिसमें शंख, घंट, काहल और मृदंग की गूंज के बीच भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और महाप्रभु जगन्नाथ को उनके भव्य रथों पर विराजमान कराया गया। सेवायतों ने परंपरागत विधि-विधान का पालन करते हुए इस अनुष्ठान को संपन्न किया। श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और भक्ति के साथ इस दिव्य दृश्य का दर्शन किया। धार्मिक परंपराओं का यह अद्भुत संगम श्रद्धा का केंद्र बना रहा।
गजपति महाराज ने निभाई छेरा पहंरा की परंपरा
पुरी के गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव ने सदियों पुरानी 'छेरा पहंरा' परंपरा का निर्वहन करते हुए सोने की झाड़ू से तीनों रथों की सफाई की। उन्होंने रथों पर सुगंधित जल का छिड़काव कर स्वयं को भगवान का सेवक बताया। यह अनुष्ठान समानता, सेवा और विनम्रता का प्रतीक माना जाता है। इस परंपरा को देखने के लिए लाखों श्रद्धालु बड़दंडा पर मौजूद रहे। यह बाहुड़ा यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों में से एक रहा।
श्रद्धालुओं ने खींचे नंदीघोष, तालध्वज और दर्पदलन रथ
छेरा पहंरा के बाद लाखों श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष, बलभद्र के तालध्वज और देवी सुभद्रा के दर्पदलन रथ की रस्सियां खींचीं। पूरे मार्ग पर भक्ति और उत्साह का अद्भुत संगम देखने को मिला। श्रद्धालु भगवान के रथ को खींचना अपना सौभाग्य मानते हैं। यात्रा के दौरान सुरक्षा और व्यवस्थाएं पूरी तरह मुस्तैद रहीं। प्रशासन ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए व्यापक इंतजाम किए थे।
सुना बेषा और अधरापणा बने आकर्षण का केंद्र
श्रीमंदिर पहुंचने के बाद रथों पर ही भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का दिव्य सुना बेषा आयोजित किया गया। तीनों देवताओं को स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत किया गया, जिसके दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु उमड़े। इसके बाद अधरापणा जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न हुए। इन आयोजनों ने रथ यात्रा की आध्यात्मिक गरिमा को और अधिक बढ़ाया। श्रद्धालुओं ने भगवान के स्वर्णिम स्वरूप के दर्शन कर स्वयं को धन्य माना।
नीलाद्रि बिजे के साथ संपन्न हुई रथ यात्रा 2026
बाहुड़ा यात्रा के अंतिम चरण में नीलाद्रि बिजे अनुष्ठान के तहत तीनों देवताओं को रथों से उतारकर पुनः श्रीमंदिर के गर्भगृह में विराजमान कराया गया। इसी के साथ वर्ष 2026 की विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा का विधिवत समापन हो गया। लाखों श्रद्धालुओं ने भगवान से सुख, समृद्धि और शांति की कामना की। प्रशासन की पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था के बीच पूरा आयोजन शांतिपूर्ण और सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह महापर्व एक बार फिर भारत की सनातन परंपरा, आस्था और सांस्कृतिक विरासत का भव्य प्रतीक बनकर सामने आया।







