सांसद मनीष तिवारी ने दलबदल कानून बदलाव की मांग: दलबदल विरोधी कानून पर 13वीं बार स्थगन प्रस्ताव

Harsh Pandya
0 सेकंड पहलेBharat Mata ki Jai! Yeh khabar garv dilati hai.
Kunal Rao
0 सेकंड पहलेHar Hindustani ko yeh padhna aur samajhna chahiye.
Nidhi kumari
0 सेकंड पहलेJai Hind! Desh pahle, baaki sab baad mein.
Ritika Ghosh
0 सेकंड पहलेBharat tab hi badlega jab log jagruk aur ekjut honge.
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में दलबदल विरोधी कानून में व्यापक सुधार की मांग उठाई है।उन्होंने मानसून सत्र के दौरान इस मुद्दे पर लगातार स्थगन प्रस्ताव के नोटिस दिए हैं।तिवारी का कहना है कि मौजूदा कानून अवसरवादी और सामूहिक दलबदल को रोकने में प्रभावी साबित नहीं हुआ है।उनके मुताबिक, यह कानून लोकतंत्र के कामकाज से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं की जड़ बन चुका है।उन्होंने नए कानून के जरिए राजनीतिक लाभ के लिए होने वाले दलबदल पर सख्ती की मांग की है।साथ ही सांसदों को नीतिगत मुद्दों पर स्वतंत्र राय रखने की अधिक आजादी देने की बात कही है।
13 बार स्थगन प्रस्ताव देकर उठाया मुद्दा
मनीष तिवारी ने दलबदल विरोधी कानून पर संसद में चर्चा कराने की मांग लगातार उठाई है।उनके अनुसार, उन्होंने इस मुद्दे पर 13 बार स्थगन प्रस्ताव का नोटिस दिया है।तिवारी चाहते हैं कि संसद में इस कानून की कमियों पर गंभीर और व्यापक बहस हो।उनका तर्क है कि मौजूदा व्यवस्था जनप्रतिनिधियों की स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति को सीमित करती है।उन्होंने कहा कि पार्टी अनुशासन और सांसदों की स्वतंत्र राय के बीच संतुलन जरूरी है।इस मांग के साथ दलबदल विरोधी कानून में सुधार को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो सकती है।
पार्टी व्हिप की सीमा तय करने की मांग
मनीष तिवारी ने पार्टी व्हिप के इस्तेमाल को सीमित करने का सुझाव दिया है।उनका मानना है कि व्हिप मुख्य रूप से सरकार की स्थिरता से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों तक सीमित होना चाहिए।अविश्वास प्रस्ताव, बजट और धन विधेयक जैसे मुद्दों पर पार्टी अनुशासन जरूरी बताया गया है।वहीं सामान्य विधेयकों और नीतिगत मुद्दों पर सांसदों को अपने विवेक से मतदान की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।तिवारी के अनुसार, इससे जनप्रतिनिधि जनता की राय और अपने विचारों को सदन में बेहतर तरीके से रख सकेंगे।उनका प्रस्ताव पार्टी अनुशासन और लोकतांत्रिक असहमति के बीच संतुलन पर जोर देता है।
क्या सांसदों को स्वतंत्र राय की आजादी मिलेगी?
दलबदल विरोधी कानून में सुधार की बहस के बीच सांसदों की स्वतंत्रता का मुद्दा भी सामने आया है।मनीष तिवारी का कहना है कि जनप्रतिनिधियों को हर मुद्दे पर पार्टी लाइन का पालन करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।उन्होंने ईमानदार और नीतिगत असहमति को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है।उनके मुताबिक, नया कानून अवसरवादी दलबदल को रोकने के साथ स्वतंत्र विचारों की रक्षा कर सकता है।इससे सांसदों को जनता के हित से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रखने का अधिक अवसर मिल सकता है।अब सवाल है कि संसद इस प्रस्ताव पर कितनी गंभीरता से चर्चा करती है।
1985 में लागू हुआ था दलबदल विरोधी कानून
भारत में दलबदल विरोधी कानून को संविधान की 10वीं अनुसूची में शामिल किया गया था।इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था।कानून का उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के राजनीतिक दल बदलने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना था।पार्टी छोड़ने या पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करने जैसी परिस्थितियों में सदस्य की अयोग्यता का प्रावधान है।बाद में कानून में बदलाव करते हुए दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन वाले विलय को मान्यता दी गई।मनीष तिवारी अब इसी व्यवस्था में व्यापक सुधार और नए प्रभावी कानून की मांग कर रहे हैं।
दलबदल कानून पर फिर शुरू होगी लोकतांत्रिक बहस
मनीष तिवारी की मांग ने दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता पर राष्ट्रीय बहस का मुद्दा फिर सामने ला दिया है।इस कानून का उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता और अवसरवादी दलबदल को रोकना रहा है।हालांकि, इसके कारण सांसदों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति और पार्टी व्हिप को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है।तिवारी ने इसी संतुलन को बेहतर बनाने के लिए नए कानून की जरूरत बताई है।उनका प्रस्ताव दलबदल पर सख्ती के साथ जनप्रतिनिधियों की स्वतंत्रता की रक्षा करने पर केंद्रित है।अब संसद में इस मुद्दे पर चर्चा होती है या नहीं, इस पर राजनीतिक नजरें टिकी हैं।







